लोगों की राय

आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग

आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :168
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4164
आईएसबीएन :0000

Like this Hindi book 6 पाठकों को प्रिय

111 पाठक हैं

आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग


मेडीकल कालेज में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों में वह सब कुछ लिखा है जो वहाँ पढ़ाया जाता है अथवा डाक्टर बनने के लिये जो जानना चाहिए किन्तु सर्जरी में कोई छात्र तब तक निष्णात नहीं हो सकता जब तक कि उसे उसी तरह की व्यावहारिक शिक्षाकुशल सर्जन के तत्वावधान में न मिले। यों आपरेशन की सारी प्रणाली चित्रों सहित पुस्तकों में लिखी रहती है फिर भी प्रत्यक्ष पथ प्रदर्शन की आवश्यकता बनी ही रहती है। इंजीनियरिंग, कला, सङ्गीत, युद्ध विद्या, रसायन आदि के बारे में भी यही बात है। ऊंची कक्षाओं की बात छोड़िये बाल कक्षा के बालकों के हाथ सचित्र बाल पोथी थमा देने पर भी वे अक्षर और अङ्क तब तक नहीं याद कर पाते जब तक कि अध्यापक का प्रत्यक्ष सहयोग उन्हें प्राप्त न हो। फिर आत्मिक प्रगति जैसे अप्रत्यक्ष अप्रचलित और दुरूह विषय का प्रशिक्षण तो एकाकी बन ही कैसे पड़ेगा।

श्रद्धा तत्व का विकास करते हुए आत्मिक प्रगति को तीव्र बनाने की दृष्टि से शिष्य का गुरु के प्रति श्रद्धावान और विनम्र होना उचित है। इससे अनुशासन, निष्ठा बनाये और क्रमबद्धता बनाये रहने में सुविधा होती है पर इसमें गुरु के लिये अहंकार करने, अपने को बड़ा मानने या अहसान जताने जैसी कोई बात नहीं है। यह एक क्रियागत प्रक्रिया है। अभिभावक अपनी सन्तान को सृष्टि के अनादि काल से पालते चले आ रहे हैं। प्रकृति ने हर प्रजनन कर्म के साथ शिशु पालन की प्रवृत्ति भी जोड़कर रखी है। ऐसी दशा में कोई सन्तान को परमार्थ क्यों माने? वह प्रकृति का स्वाभाविक क्रम है जिसे पालन किया ही जाना चाहिये। जो उसे पतित करेगा वह दोषी बनेगा। कोई प्रजनन में तत्पर रहे और फलस्वरूप उत्पन्न होने वाली सन्तान के प्रति उपेक्षा क्रूरता बरते, उससे विमुख हो जाय तो सामाजिक, राजकीय और ईश्वरीय दण्ड का भागी बनेगा। यही बात गुरु शिष्य के बारे में भी है। जब किसी की सहायता से गुरु को भी कुछ मिला है तो उस क्रम को आगे बढ़ाने के लिये दूसरों की-अपने छात्रों की सहायता पवित्र कर्तव्य मानकर करनी चाहिये। इसमें न अहसान जताने की आवश्यकता है न अहङ्कार करने की। सच तो यह है कि यदि कोई छिपाता है और अनुदान में आना कानी करता है तो वह अपनी महानता ही खो बैठता है। शिष्य अपनी पात्रता सिद्ध करे श्रद्धालु और अनुशासित रहे यह उसी के पक्ष में-उसी को लाभान्वित करने वाली अलग बात है।

रामकृष्ण परमहंस बनने के लिये जन्म-जन्मान्तरों की कठोर साधना अभीष्ट है, पर विवेकानन्द बनना सरल है। समुद्र बनना कठिन है, पर उसका पानी लेकर आकाश में बादल की तरह उड़ने लगना सरल है। समर्थ गुरु रामदास बनने के लिये जन्म की गति कठिन और तलवार की धार पर चलने जैसी साधना करने का साहस सामान्य व्यक्तियों के पास नहीं होता। शिवाजी के रूप में एक नगण्य से व्यक्तित्व वाले बालक को विकसित हो जाना भी सरल है। पारसमणि बनना कठिन है पर लोहे का उसे छूकर सोना बन जाना सरल है। चाणक्य जैसी अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व कर सकने वाली सत्ता बन सकना हर किसी का काम नहीं। पर एक दासी पुत्र का दिग्विजयी सम्राट बनकर सफल होना सरल है। बुद्ध जैसी प्रतिभाएं कभी कभी ही-ईश्वरीय इच्छानुसार अवतरित होती हैं पर उनकी छाया से अशोक, आनन्द, अंगुलिमाल, आम्रपाली आदि असंख्य व्यक्ति लघुता की परिधि लाँघते हुए महत्ता का वरण कर सके हैं। गाँधी कभी-कभी ही उत्पन्न हो सकते हैं पर उनका अनुगमन करने वाले व्यक्ति राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री, लोक नेता और ऐतिहासिक महापुरुषों की पंक्ति में अपनी गणना सहज ही करा सकते हैं।

आत्मिक प्रगति की उपलब्धियाँ-भौतिक प्रगति की तुलना में असंख्य गुनी सामर्थ्य सम्पन्न और हर्षोल्लासमय हैं। उन्हें प्राप्त कर सकना मानव जीवन की सबसे बड़ी और सबसे महान सफलता है। जो इस दिशा में बढ संका समझना चाहिये हर दृष्टि से कृतकृत्य हो गया। प्रचलित और प्रत्यक्ष मान्यतायें भौतिक सफलताओं को सर्वोपरि मानती हैं पर यदि विवेक युक्त दूरदृष्टि से विचार किया जाय तो प्रतीत होगा कि यह मान्यता सही नहीं है। आत्मबल सम्पन्न महामानवों का जीवन विद्वेषण करें-उनके द्वारा उपार्जित आन्तरिक आनन्द और बाह्य अनुदानों का मूल्यांकन करें तो प्रतीत होगा कि संसार का बड़े से बड़ा सुसम्पन्न व्यक्ति भी उस तुलना में अत्यन्त पिछड़ा हुआ है। सम्पन्नता के साथ जुड़े हुए मतिभ्रम और क्लेश कलह द्वेष दुर्भाव को भी समझा जाय तो प्रतीत होगा कि सम्पन्नता जन्य मात्र दृष्टि और कल्पना जंजाल भर है। सुखी बनने के लिए सम्पदाएँ नहीं-विभूतियाँ आवश्यक हैं जो आत्मिक प्रगति के पथ पर चलते हुए भी प्राप्त की जा सकती हैं।

* * *

...Prev |

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ

    अनुक्रम

  1. सर्वशक्तिमान् परमेश्वर और उसका सान्निध्य

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book