|
आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोगश्रीराम शर्मा आचार्य
|
111 पाठक हैं |
||||||
आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग
आध्यात्मिक साधना के क्षेत्र में प्रगति करने के लिए भी यह सहयोग नितान्त आवश्यक है। राम और लक्ष्मण का युग्म ही लंका विजय में समर्थ हुआ है। महाभारत की सफलता कृष्ण और अर्जुन के मिलन ने संभव की थी। छात्र कितना ही परिश्रम करे बिना शिक्षक के मौखिक या लिखित ज्ञान दान के बिना उच्च शिक्षा प्राप्त करने में समर्थ नहीं होता। कला शिल्प विज्ञान, चिकित्सा जैसे महत्त्वपूर्ण विषयों के विद्यार्थी मात्र मौखिक ही नहीं क्रियात्मक व्यावहारिक शिक्षा ही प्राप्त करते हैं इसके बिना वे विषय में निष्णात पारंगत नहीं हो सकते।
गुरु और शिष्य मिलकर यही प्रयोजन पूर्ण करते हैं। कान में मंत्र फूंक देना या कर्मकाण्ड विधि-विधान बता देने से काम नहीं चल सकता। उन्हें अपनी शक्ति का एक अंश भी देना पड़ता है इस अनुदान के बिना आत्मिक प्रगति के पथ पर बहुत दूर तक नहीं चला जा सकता। पहाड़ों की ऊंची चढ़ाई चढ़ने के लिए लाठी का सहारा लेना पड़ता है। छत पर चढ़ने के लिए सीढ़ी का अवलम्बन चाहिए। यही प्रयोजन आत्मिक प्रगति के पथ पर चलने वाले पथिक के लिये उसका मार्गदर्शक-एवं साथी सहयोगी पूरी करता है। गुरु की आवश्यकता इसी प्रयोजन को पूर्ण करने के लिए पड़ती है।
माता के उदर में रखे बिना, अपना रक्त, मांस दिये बिना, दूध पिलाये और पालन किये बिना भ्रूण की जीवन प्रकिया गतिशील नहीं हो सकती। बालक भोजन, वस्त्र, आदि की सुविधायें स्वयं उपार्जित नहीं कर सकता उसे उसके अभिभावकों की सहायता अभीष्ट होती है। छात्र अपने आप पढ़ तो सकता है पर उसे पुस्तक, फीस आदि का खर्च पिता से और शिक्षण सहयोग अध्यापक से प्राप्त करना पड़ता है। इसके बिना उसका शिक्षा क्रम एकाकी पुरुषार्थ से नहीं चल सकता। माता-पिता अपनी संतान का पालन पोषण करते हैं वे बच्चे बड़े हो जाने पर अपने बच्चों के लालन पालन की जिम्मेदारी उठाते हैं यह क्रमानुगत परंपरा चलती रहती है। अध्यात्म मार्ग की प्रक्रिया भी इसी प्रकार चलती है। गुरु अपने शिष्य को अपनी तप पूँजी प्रदान करता है तदुपरान्त शिष्य भी उसे अपने लिए दाब कर नहीं बैठ जाता वरन् उस परंपरा को अग्रगामी रखते हुए अपने छात्रों की सहायता करता है।
यों धर्म के दस लक्षणों और यम नियम के दस योग आधारों का पालन करते हुए कोई भी व्यक्ति सहज सरल रीति-नीति से जीवन लक्ष्य प्राप्त कर सकता है न इसमें किसी गरु की आवश्यकता है न शिष्य की, राजमार्ग पर सही पैरों से चल पड़ने वाला व्यक्ति मील के पत्थरों को देखते हुए यथा स्थान पर पहुंच सकता है पर जिसे उस यात्रा के समीप वर्ती अद्भुत स्थलों को देखना जानना और वहाँ मिलने वाली उपलब्धियों से लाभान्वित होना हो उसे उस क्षेत्र से परिचित और उपलब्ध हो सकने वाली वस्तुओं को देने दिलाने में कुशल किसी अनुभवी सहयोगी की आवश्यकता पड़ती है। यदि यह सुयोग न मिल सके तो फिर यात्रा चलती रहती है पर वह नीरस एवं अतिरिक्त उपलब्धियों से रहित एक गतिशीलता मात्र ही रह जाती है। अध्यात्म पथ में प्रगति करते हुए उस यात्रा से सम्बंधित विभूतियों को प्राप्त करते हुए हर्षोल्लास का आनंद लेते चलना हो तो फिर कुशल सहयोगी की सहायता अनिवार्य ही हो जायेगी। गुरु शिष्य का सम्मिलन, सम्मिश्रण उसी आवश्यकता की पूर्ति करता है।
|
|||||









