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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोगश्रीराम शर्मा आचार्य
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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग
प्रगति और सफलता के लिए समर्थ सहयोग की आवश्यकता
गुरु शिष्य की भूमिका को उन्होंने अध्यात्म मार्ग का सघन सहयोग बताया। जहाँ शिष्य समर्थ गुरु की सहायता से आगे बढ़ता है वहाँ गुरु भी अपने ऋण से उऋण होता है।
पारस्परिक सहयोग की अविच्छिन्न प्रक्रिया विकास का ही नहीं आनन्द का भी आधार है। भौतिक जगत में पग-पग पर इस तथ्य को अनुभव किया जा सकता है। परमाणु जिसे सबसे छोटी इकाई माना जाता है एकाकी नहीं है वरन् न्यूट्रोन, प्रोटोन आदि अपने सहयोगियों के आधार पर सृष्टि का क्रिया कलाप संचालित किये रह सकने में समर्थ होता है। आकाश में ग्रह नक्षत्र पारस्परिक आकर्षण में जकड़े रहने के कारण ही आकाश में अधर लटके हुए हैं। पंच तत्त्वों का सम्मिश्रण यदि न हो तो इस विश्व का अस्तित्व ही प्रकाश में न आये। हर कोई जानता है कि विवाह बन्धन के साथ कितने उत्तरदायित्व, बन्धन और कर्तव्य जुड़े हुए हैं। उन्हें निबाहते-निबाहते आदमी का कचूमर निकल जाता है। नारी को प्रसव की विकट पीड़ा; शिशुपालन का कठिनतम कार्य और पति तथा ससुराल वालों को प्रसन्न रखने में लगभग आत्म समर्पण जैसी तपस्या करनी पड़ती है। नर को भी कम भार वहन नहीं करना पड़ता। इन कठिनाइयों से परिचित होते हुए भी हर कोई विवाह की आशा लगाए बैठा रहता है और वैसा अवसर आते ही हर्षोल्लास अनुभव करता है। जिन दाम्पत्य जीवन में सघन आत्मीयता विकसित होती है उन्हें वह पारस्परिक
सान्निध्य स्वर्गापम प्रतीत होता है। अगणित कठिनाइयों को वहन करते हुए भी हर घड़ी आनन्द उमड़ता रहता है यह सब देखते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि व्यक्तियों की आत्मिक घनिष्टता कितनी तृप्ति और कितनी शांति प्रदान करती है।
पति-पत्नी का तो ऊपर उदाहरण मात्र दिया गया है। रिश्ते कुछ भी क्यों न हों-पुरुष पुरुष-और नारी नारी के बीच भी ऐसी आन्तरिक सघनता हो सकती है। उस मित्रता को किसी भी रिस्ते का नाम दिया जा सकता है और बिना रिस्ते के केवल आत्मीय माना जा सकता है। यही 'प्रेम' है। प्रकृति के अनुरूप व्यक्तियों से आरम्भ होकर मनुष्य समाज-प्राणि मात्र और तदनन्तर विश्व ब्रह्माण्ड में संव्याप्त जड़ चेतन में प्रेम फैलता विकसित होता चला जाता है। आनन्द का उद्भव और विस्तार यहीं से होता है। अन्त:करण की कोमलता, मृदुलता, सरलता और सरसता ही वस्तुतः मानव जीवन की सम्पदा हैं, जो स्नेह सिक्त है, जो सहृदय और उदार है उसे ही आत्मिक विभूतियों से सुसम्पन्न सिद्ध पुरुष कहना चाहिए। ऐसा व्यक्ति ही महामानव, देवदूत और दिव्य सत्ता सम्पन्न कहलाता है। आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग जिसे प्राप्त हो गया, समझना चाहिए कि उसने पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त कर लिया। अभाव तो एकाकीपन में ही है।
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