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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग

आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :168
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4164
आईएसबीएन :0000

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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग


अशुद्ध चिन्तन मनुष्य को लोभी, स्वार्थी, कृपण, शोषक तथा संग्रही बनाता है, यदि वह अशुद्ध, शुद्ध हो जाय तो वही व्यक्ति अपनी सम्पदा एवं विभूति को लोक मंगल के लिये उत्सर्ग करके अपना जीवन धन्य बनाने तथा दूसरों को आदर्शवादी प्रेरणायें देने में समर्थ हो सकता है। व्यक्ति तथा समाज का हित अनहित वर्तमान और भविष्य उनकी आस्थाओं तथा चिन्तन की धाराओं पर निर्भर है। हमें इसी मर्मस्थल का स्पर्श करना चाहिये और उन उपायों को खोज निकालना चाहिये कि समग्र चिन्तन की-अध्यात्म की धारा सत्पथगामिनी बनकर विश्व-मंगल की सम्भावनायें मूर्तिमान कर सके।

विवेकवान दूरदर्शी और प्रबुद्ध वर्ग के समस्त प्रयास उसी दिशा में केन्द्रीभूत होने चाहिये कि जनमानस का प्रवाहित होने वाला समग्र चिन्तन अध्यात्म वर्तमान निकृष्ट स्तर से ऊँचे उठे तथा उत्कृष्टता की आस्थाओं से अनुप्राणित रह सके। इसी एक प्रक्रिया पर मानवजाति का भविष्य निर्भर है। सुख-सुविधाएँ बढ़ाने के लिये बहुत कुछ किया जाता रहा है, किन्तु चिन्तन न बदला तो विज्ञान तथा धन द्वारा उपलब्ध हो सकने वाली विपुल सुविधाएँ भी हमें सुख-शांति से वंचित ही करती रहेंगी। अंतरङ्ग में जलने वाली दुर्बुद्धि की आग शाँति और सुव्यवस्था को भस्म करके ही छोड़ेगी।

हमारा ज्ञान-यज्ञ इसी महान प्रयोजन की पूर्ति के लिये है। इसकी सफलता, असफलता पर भावी शांति अथवा विपत्ति की सम्भावनाएँ जुड़ी हुई हैं। प्रबुद्ध परिजनों का कर्तव्य है कि वे इस महान अभियान को सर्वाङ्गीण सफलता की ओर अग्रसर करने में अपना योगदान देने में कुछ उठा न रखें।



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    अनुक्रम

  1. सर्वशक्तिमान् परमेश्वर और उसका सान्निध्य

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