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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोगश्रीराम शर्मा आचार्य
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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग
ओछा तत्त्व-दर्शन अपनाये रहने वाला व्यक्ति और समाज कभी भी ऊँचा नहीं उठ सकता। दर्शन ही प्रेरणाओं का आधार है। उसी के अनुरूप विचारणायें, आकांक्षायें और क्रियायें उत्पन्न होती हैं। दर्शन ही व्यक्ति को ढालता है और उसी ढाँचे में समाज का कलेवर खड़ा होता है। हम अपने समाज और संसार को समर्थ समृद्ध और सुविकसित बनाना चाहते हों तो उसका सर्व प्रमुख उपाय यही है कि वर्तमान दार्शनिक विकृतियों का परिशोधन किया जाय।
यदि इस स्थिति को सधारा, संभाला और बदला न गया तो भावी परिस्थितियाँ दिन-दिन अधिक भयावह होती चली जायेंगी। वैयक्तिक जीवन में आदर्शवादिता और उत्कृष्टता उत्पन्न करने वाला जब प्रकाश ही बुझ जायेगा तो अन्धकार में भटकने वाला दुर्दशा ग्रस्त ही होगा। लोग बुराई की ओर बढ़ेंगे और बुरी परिस्थितियाँ पैदा करेंगे। इससे सर्वत्र दुर्गन्ध और दुर्गति ही दृष्टिगोचर होगी। और हम सब पारस्परिक विद्वेष असहयोग एवं छल-छद्म की आग में जलकर सामूहिक आत्म-हत्या कर लेंगे।
आज की महत्तम आवश्यकता यह है कि हमारा तत्त्वज्ञान और दर्शन अपने सौम्य पथ से भ्रष्ट होकर जिस अवांछनीय दिशा में चल पड़ा है, उसे रोका और टोका जाय। दिग्-भ्रांत जन मानस को वस्तुस्थिति से परिचित कराया जाय और अध्यात्म के महान स्वरूप, उपयोग एवं प्रतिफल से भलीभांति परिचित कराया जाय। आत्मा की आकांक्षा पूर्णता के लक्ष्य पर बढ़ने के लिए स्वभावत: उल्लसित होती रहती है, यदि उसे सही मार्ग मिले तो निस्संदेह उससे व्यक्ति को आत्म-शांति और समाज को समर्थता एवं सम्पन्नता का लाभ मिल सकता है। पर जब उसे बहका-भटका दिया जाय तो फिर विपथ गामिनी धारा विग्रह एवं अवांछनीय परिस्थितियाँ ही उत्पन्न करेंगी। अस्तु हम अपना सारा प्रयत्न इस तथ्य पर केन्द्रित करें कि जनमानस की आस्थाओं, मान्यताओं दिशाओं एवं गतिविधियों को प्रभावित करने वाली अध्यात्म पथ भ्रष्टता से विरत होकर उस दिशा में चलें, जिस पर लाखों करोड़ों वर्षों तक हमारे पूर्वज चलते और गौरवान्वित होते आये हैं।
चिन्तन की दिशा बदलना ही युग परिवर्तन है। परिवर्तन का केन्द्र बिन्दु चिन्तन ही है। चिन्तन की बदली हुई दिशायें ही व्यक्ति को विविध विधि भली-बुरी गतिविधियाँ अपनाने के लिये प्रेरित एवं प्रस्तुत करती हैं। निकृष्ट चिन्तन व्यक्ति को दुष्ट, दुराचारी, पतित, पिशाच, उच्छृङ्खल एवं अवांछनीय स्तर का बना सकता है और यदि चिन्तन की धारा उत्कृष्टता की ओर मुड़ जाय तो वही व्यक्ति सन्त,सज्जन, महान, विचारवान, विद्वान एवं परमार्थ परायण बनकर देवत्व की भूमिका सम्पादन कर सकता है।
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