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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोगश्रीराम शर्मा आचार्य
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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग
अध्यात्म दर्शन में उत्पन्न हुई विकृतियों ने हमारा मानसिक और सामाजिक ढांचा चरमरा कर रख दिया है। विद्या, सदाचार लोक सेवा और उदात्त मनोभूमि के कारण पूजे जाने वाले साधु ब्राह्मण जब वंश और वेष के आधार पर पूजा प्रतिष्ठा प्राप्त करने लगे तो उन महान् गुणों की ओर ध्यान देना ही बन्द हो गया। ओछे लोग जहाँ भी पूजे जायेंगे, वहाँ विकृतियाँ ही बढ़ेगी, कर्म के आधार पर आरम्भ हुआ वर्णाश्रम धर्म वंश पर अवलम्बित हो गया और उसमें नीच-ऊंच का भेद भाव घुस गया तो ब्राह्मण दुर्गुणी होने पर भी पूजा जाने लगा और शूद्र सद्गुणी होने पर भी दुत्कारा जाने लगा। जहाँ गुणों का वर्चस्व समाप्त हो जाय और अकारण ही लोगों को मान या अपमान मिलने लगे तो वह समाज अपनों की और दूसरों की दृष्टि में अध:पतित होगा ही। झूठी मान्यताओं ने एक ओर तथाकथित उच्चवर्ग को अनावश्यक सम्पत्ति देकर उन्हें दान-दक्षिणा की मुफ्तखोरी का चस्का लगाया, दूसरी ओर तथाकथित नीच वर्ग को मानवता के न्यायोचित अधिकारों से भी वंचित करके अछूत बना दिया। इसी तिरस्कृत वर्ग का एक बड़ा भाग विधर्मी होता चला गया और हिन्दू समाज से प्रतिशोध लेने के लिए पिल पड़ा। अपनी सामाजिक परमात्मा दुर्बलता का यह एक बहुत बड़ा कारण है।
नारी जाति को अविश्वस्त प्रतिबन्धित, बन्दिनी और रमणी की दुर्दशा में धकेल देने वाली संकीर्ण विचारधारा हमारी धर्म की आड़ में न जाने से वह कटीली झाड़ियों की तरह उठ आई और आधे समाज को लकवा के रोगी की तरह अपंग करके रख दिया। विवाह शादियों में धर्म के नाम पर इतना अपव्यय करने को मजबूर होना पड़ा कि व्यक्ति को बेईमान और दरिद्र बनने के अतिरिक्त और कोई चारा न रह गया। मरने के बाद उसके कुटुम्बी लम्बी चौड़ी दावत देकर मृतक भोज करें, यह कैसी घृणित और दयनीय प्रथा है। भूत पलीत, कुटुम्ब-कुटुम्ब और गाँव-गाँव के अगणित देवता लोगों का मनोबल दुर्बल करने, आतंक उत्पन्न करने और अपव्यय कराने के लिए धर्म की आड़ में ही उगे हैं। अपनी कुरीतियों का अंत नहीं। और यह एक तथ्य है कि कुरीतियों के साथ अनैतिकता का अविच्छिन्न सम्बन्ध है। आज के विकृत धर्म ने हमें अन्ध-विश्वासी ही नहीं अनैतिक एवं दीन, दरिद्र भी बना दिया।
इस दयनीय दुर्दशा से अब निकलना ही होगा और दार्शनिक विकृतियों से पिण्ड छुड़ाने के लिये आगे बढ़ना ही होगा। अन्यथा हमारी दुर्दशा ग्रस्त मनोदशा व्यक्ति एवं समाज का स्तर दिन-दिन गिराती और बिगाड़ती ही चलेगी और इस पतनोन्मुख पथ पर चलते हुये अन्ततः हम कहीं के भी न रहेंगे। पूर्वकाल में हम ३० करोड़ व्यक्ति इसी दार्शनिक भ्रष्टता के शिकार होकर १५ हजार विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा पद-दलित होकर एक हजार वर्ष तक गलामी के बन्धनों में बंधे रहे हैं। अब भी यदि इन्हीं विकृतियों को छाती से चिपकाये बैठे रहे तो अगले दिनों हमारे दुर्भाग्य का ठिकाना न रहेगा।
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