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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग

आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :168
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4164
आईएसबीएन :0000

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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग


आनन्द छोड़कर दुर्भाग्य वरण करने की अपनी इस विकृत विचारणा का खोट-काश हम समझ सके होते तो कितना अच्छा होता। मनुष्य जीवन की महान् उपलब्धि का गर्व-गौरव-मूल्यमहत्व काश, अपनी समझ में आ गया होता तो हर्ष और सन्तोष की उमङ्गों से भरा सौभाग्य हर घड़ी अनुभव करते होते। पर इस भूल को क्या कहा जाय जिसने अमृत ठुकरा कर विष बटोरने की प्रवृत्ति सिखा दी और उल्लास का परित्याग कर संताप अपनाने की प्रवृत्ति बना दी। अच्छा होता यदि इस भूल को हम समझे होते और अपनी विचारणा की दिशा बदलने के लिये तैयार हुए होते।

परमेश्वर ने मनुष्य जीवन को इतनी बड़ी उपलब्धि जो ८४ लाख योनियों में से किसी को भी नहीं मिली है अकारण ही नहीं दी है। ऐसा करके उसने हमारे साथ पक्षपात एवं दूसरे प्राणियों के साथ अन्याय नहीं किया है। उसके लिये सभी पुत्र-सभी प्राणी-एक समान प्रिय हैं। सभी को समान दृष्टि से देखता और समान प्यार करता है। समान सुविधायें देना भी उसे अभीष्ट है। सब प्राणियों को प्रायः एक सी स्थिति में रखा भी है। मनुष्य को जो अतिरिक्त सुविधायें दी हैं, वे उपभोग के लिए नहीं वरन् किसी अतिरिक्त प्रयोजन के लिये धरोहर रूप में दी हैं। वे मानवीय विशेषतायें जो अन्य प्राणियों को नहीं मिलीं, एक पवित्र थाती के रूप में इसलिये सौंपी गई हैं कि उनका उपयोग ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति के लिए किया जाय, बन्दूक का लाइसेन्स सरकार किसी जिम्मेदार एवं प्रामाणिक व्यक्ति को ही देती है। साथ ही साथ यह शर्त भी लगा देती है कि-"उसका चोरी, डकैती आदि अवांछनीय कार्य में प्रयोग न किया जाय। इतना ही नहीं यदि उस क्षेत्र में किसी की सुरक्षा खतरे में हो तो उस बन्दूक को लेकर मुकाबिला करने के लिए आया जाय।" जो इस शर्त को पूरा नहीं करते, विपरीत आचरण करते हैं सरकार उनकी बन्दूक भर्त्सना पूर्वक जब्त कर लेती है। अपनी स्थिति भी ऐसी ही है। जो अतिरिक्त सुविधायें मिली हैं वे वासना और तृष्णाओं की पूर्ति के लिये नहीं वरन् किन्हीं महान् प्रयोजन के लिये हैं। यदि हम उस उत्तरदायित्व को भुला दें तो ईश्वरीय उद्देश्य को ही व्यर्थ कर देने के अपराधी सहज ही बन जाते हैं।

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    अनुक्रम

  1. सर्वशक्तिमान् परमेश्वर और उसका सान्निध्य

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