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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोगश्रीराम शर्मा आचार्य
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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग
एक असामान्य और अतिरिक्त उपलब्धि के रूप मेंईश्वरीय उपहार के रूप में हमें बुद्धिबल मिला है। इसका उपयोग चतुरता और कुशलता पूर्वक किया भी जाता है। इसी विभूति का उपयोग करके हम अनेक साधन सुविधायें उपार्जित करते, बढ़ाते और उनका उपयोग करते रहते हैं। इस उपयोग पर गर्व भी करते और खुशी भी मनाते हैं। पर यह कभी नहीं सोचते कि क्या यह महान उपलब्धि इसी प्रयोजन के लिए मिली है जिसमें उपयोग किया गया? यदि इस लक्ष्य पर गम्भीरता पूर्वक विचार करें तो दो तथ्य उभर कर सामने आते हैं। एक यह कि ईश्वर पक्षपाती और अन्यायी है; क्योंकि मनुष्य को उसने अगणित सुविधायें दी और अन्य प्राणियों को उनसे वंचित रखा। दूसरा यह कि यदि ईश्वर न्यायकारी और समदर्शी है तो उसके यह अनुदान उपयोग के लिये किसी ऐसे अतिरिक्त प्रयोजन के लिये हैं जिसे समझने और स्वीकार करने में हम भयङ्कर भूल करते चले जा रहे हैं। ईश्वर को पक्षपाती अन्यायी मानने वाली बात सही नहीं। सचाई यह है कि हम ही जीवनोद्देश्य को समझने में भारी भूल करके ईश्वरीय उद्देश्य को व्यर्थ बनाने और नष्ट करने पर तुले हुए हैं। दूसरों के साथ दिल्लगीबाजी की जा सकती है पर ईश्वर के महान प्रयोजन को झुठलाया नहीं जा सकता, उसके साथ मखौल करके चतुरता का दावा नहीं किया जा सकता। यह चतुराई अन्ततः भारी मँहगी पड़ेगी।
पेट और प्रजनन की पूर्ति के लिये किये गये प्रयास किसी बड़ी बुद्धिमत्ता के प्रतीक नहीं हो सकते। कीड़े-मकोड़े और पशु पक्षी भी इन प्रयोजनों की पूर्ति में कुशल और सफल रहते हैं। इतनी भर बात के लिये यदि मनुष्य जीवन जैसी महान् उपलब्धि यों खर्च हो जाय तो इसमें बुद्धिमत्ता की-अतिरिक्त बुद्धिबल के सदुपयोग की बात कहाँ रही? विचारणीय यह है कि क्या हम पेट और प्रजनन जैसी पशु प्रवृत्ति के ऊपर उठकर कुछ और चाहते, सोचते और करते हैं? यदि नहीं, तो क्या यही हमारा जीवनोद्देश्य, लक्ष्य और महान् उपलब्धियों.का सदुपयोग है? इन प्रश्रों पर बार-बार-हर बार अनेक बार-विचार करना चाहिए। यदि यह दिखाई दे कि हम अनुपयुक्त दिशा में चल रहे हैं और अवांछनीय गतिविधियाँ अपना रहे हैं तो विवेक एवं दूरदर्शिता का तकाजा यही है कि अपनी भूल को सुधारें और उस क्रिया-कलाप को रोकें जिसे अपनाने पर केवल पश्चात्ताप ही हाथ लगने वाला है।
पशु केवल वर्तमान को देखता है। न वह भूतकाल के अनुभवों और निष्कर्षों पर विचार करता है और न आगे होने वाले भले-बुरे परिणामों के सम्बन्ध में सोचता है। उसे केवल आज का-अभी का आकर्षण प्रभावित करता है और उसी से प्रभावित होकर वह जो प्रिय लगता है-करता है। लगता है यही रीति-नीति हमने भी अपना ली है। भूतकाल जितनी विषम योनियों में होकर गुजारा और इस अलभ्य अवसर को-मानव जीवन को गँवा देने पर आत्मग्लानि-ईश्वर की नाराजी, कर्त्तव्य भुलाने की प्रताड़ना तथा फिर ८४ लाख योनियों में भ्रमण करने की अन्धकार भरी सम्भावना पर विचार करें तो विवेक यही कहेगा कि जीवनोद्देश्य की पूर्ति के लिये कुछ करना आवश्यक है। वासना और तृष्णा ही सब कुछ नहीं है, इन दो की परिधि में सारी विचारणा और अभिरुचि केन्द्रीभूत किये रहना ही बुद्धिमत्ता नहीं है वरन् यह भी समझदारी ही है कि मानव शरीर जैसे बहुमूल्य सुअवसर का सदुपयोग करने की बात सोची जाय। पेट और प्रजनन के लिए सारा समय और सारा उत्साह नियोजित किये रहना और उन क्षेत्रों में से कुछ क्षेत्रों की हँसी खुशी प्राप्त करते रहना सर्व विदित बुद्धिमत्ता मानी जाती जरूर है, पर वास्तविकता वैसी है नहीं। इन सुविधाओं को तो कृमि कीट भी जुटा लेते हैं-कीड़े-मकोड़े भी पेट पालते और बच्चे जनते हैं-यह दो कार्य ही मनुष्य जैसे विशिष्ट प्राणी के हिस्से में आये, वह इन्हीं दो आकर्षणों में बँधा विचरता रहा तो उसकी क्या विशेषता रही? बुद्धिमत्ता ने उसे विशिष्टता क्या प्रदान की?
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