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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग

आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :168
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4164
आईएसबीएन :0000

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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग


भौतिक सुख ही पाना है तो वह कम से कम कुछ तो टिकाऊ होना ही चाहिए, जो आने के साथ ही विदा हो जाय-क्षण भर भी न रुके-और जिसका परिणाम पश्चाताप एवं प्रताड़ना के रूप में मिले, भला वह भी कोई सख है। जीभ का चटोरापन कल्पना में तो बड़ा आकर्षक लगता है। स्वादिष्ट पदार्थों को जब तक खाया नहीं है तब तक वे बड़े आकर्षक लगते और मन को ललचाते हैं पर जब खाने बैठते हैं तो पाँच मिनट भी नहीं बीतते कि पेट भर जाता है और उन आकर्षक पदार्थों का एक ग्रास भी पेट में ठूसना कठिन हो जाता है और वे बुरे, अनाकर्षक लगने लगते हैं। जो सुख पाँच मिनट भी स्थिर न रह सके पेट को अनावश्यक रूप में भरने और पीछे अस्वस्थता में फंसने की भूमिका बनाये, भला वह भी कोई महत्वपूर्ण सुख है। ऐसी जीभ लोलुपता के लिये-अति आकर्षित रहने, व्यंजनों के लिये बहुत समय और धन कमाने तथा नीति अनीति का ध्यान रखे बिना साधन जुटाने के लिए यदि हमारी प्रवृत्ति होती है। तो उसे समझदारी कैसे कहें? रूखा-सूखा खाकर-स्वास्थ्य सँभाले रहने वाली सस्ती खाद्य सामग्री पर सन्तोष करके, स्वल्प श्रम और स्वल्प समय में काम चलाऊ व्यवस्था जुटाई जा सकती है। ऐसा सन्तोष कर लेना और इस जंजाल से बचाई हुई शक्ति को महत्वपूर्ण कार्यों में लगाना दूरदर्शिता ही मानना चाहिए-ना समझी नहीं। होटलों के रहने, व्यंजनों के व्यय और स्त्रियों का सारे दिन चौके-चूल्हे का जाल जंजाल बुनते रहना, समय व शक्ति का सदुपयोग कहाँ हुआ? क्षणिक लिप्सा हमारी महत्वपूर्ण क्षमताओं का अपव्यय और दुरुपयोग करे यह मानवीय बुद्धिमत्ता की एक दुर्भाग्य विडम्बना ही कही जायेगी?

पेट के बाद प्रजनन आता है। यद्यपि वह जीभ से अधिक आकर्षक लगता है, पर है उससे गये-गुजरे दर्ज का। जीभ कम से कम शरीर चलाने के लिये कुछ रस रक्त का साधन तो जुटाती है और आहार के बाद कुछ बल एवं उत्साह दे देती है पर काम कौतुक में तो वैसा भी कुछ नहीं है। कुछ क्षण एक उन्माद सा आता है और नशा उतरने पर थके, टूटे शराबी की तरह शरीर अशक्त लुञ्ज-पुञ्ज, गिरा-मरा, निर्जीव, निष्प्राण सा बन जाता है। यह जंजाल हर बार शरीर और प्राण के भण्डार को बुरी तरह घटाता और तोड़ता चलता है। जिस शक्ति के ऊपर चेहरे का तेज, वाणी का प्रभाव, मस्तिष्क की प्रखरता, आत्मबल की ज्योति, शरीर की परिपुष्टता आदि विभूतियाँ अवलम्बित हैं उसे गन्दी नाली में निचोड़ते रहने और खोखलेपन का भार पल्ले बाँधते चलना समझदारी का आधार नहीं है।

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    अनुक्रम

  1. सर्वशक्तिमान् परमेश्वर और उसका सान्निध्य

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