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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग

आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :168
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4164
आईएसबीएन :0000

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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग


सन्तान पल्ले बँध जाती है तो उसे निबाहना और सँभालना ही पड़ता है। प्रकृति ने मन में एक आकर्षण जोड़ दिया है सो संतान पालन जैसे व्यय साध्य और कष्ट साध्य काम को करने के लिए भी प्राणी करता ही रहता है। पर विवेकपूर्ण देखा जाय तो लगेगा कि इतनी शक्ति जितनी सन्तान पैदा करने, पालने और दुःखद परिणाम भोगने में होती है, उतनी बचाकर यदि कोई आत्म-कल्याण एवं परमार्थ प्रयोजनों में नियोजित कर सकता हो तो महामानव एवं नरनारायण बन सकता है। किसी जमाने में बच्चे पैदा करना सूखी जमीन को सरसब्ज बनाने के लिए आवश्यक रहा होगा। आज तो हर नया बालक धरती पर अभिशाप और जन-समाज के लिये विपत्ति बनकर ही जन्मता है। उपभोग की साधन सामग्री बढ़ नहीं रही है, धरती ने अधिक अन्न उगाने की शक्ति से इनकार कर दिया है- ऐसी दशा में भी बच्चों के भार को बढाते चलना-भूखे मरनेपरस्पर लड़ कटकर नष्ट हो जाने अथवा वृष्टि अनावृष्टि, महामारी आदि दैवी विपत्तियाँ आमन्त्रित करना ही कहा जायेगा। आज की परिस्थितियाँ कहती हैं कि कम से कम २० वर्ष तो बच्चे पैदा करना एक दम बन्द कर दिया जाय और पीछे परिस्थितियों के अनुरूप एक ही बच्चे की बात वे लोग सोचें जिनके पास उन्हें सुसंस्कृत, सुविकसित एवं परिपुष्ट बनाने के समुचित साधन विद्यमान हों। साधनों के अभाव में पैदा किये हुए बच्चे रुग्ण, मूर्ख, दुर्गुणी एवं धरती के भार ही बन सकते हैं, ऐसा प्रजनन समस्त समाज के लिए अभिशाप बनता है और उन काम-क्रीड़ा में प्रवृत्त दुर्बुद्धि माता-पिता पर लानत की वर्षा करता है।

यौन आकर्षण वस्तुतः एक जुगुप्सा मात्र है, जिसे छिपाव,दुराव और रङ्ग-बिरंगी लीपा पोती ने तिल का ताड़ और मनोवैज्ञानिक जंजाल बनाकर खड़ा कर दिया है। समस्त जीव-जन्तु नंगे फिरते हैं और उन पर कोई धर्म बन्धन भी नहीं है फिर भी प्रकृति प्रेरणा उनकी इतनी न्यून होती है कि मादा की आवश्यकता पर ही नर को कुछ उत्साह आता है। वन्य प्रदेशों के प्रकृति पुत्र भले ही असभ्य कहे जायें पर वे बिना अनावश्यक यौन आकर्षण प्रदीप्त कियेसामान्य सहचरों जैसा जीवन जीते हैं। नर-नारी का जो खिंचाव तथा कथित सभ्य समाज में पाया जाता है वह सर्वथा कृत्रिम एवं अनांछनीय है। सङ्गीत, चित्र, कविता, साहित्य की विकृत कलाकृतियों ने व्यर्थ ही मनुष्य में कृत्रिम जुगुप्सा जगाई है, उसे व्यर्थ के जाल-जंजालों में भटकाया है।

किसी महत्वपूर्ण प्रयोजन के लिए विवाह भी आवश्यक हो सकता है पर हर कोई इस महान् उत्तरदायित्व के सँभालने की क्षमता न होने पर भी ललचाये यह बुरी बात है। कोई सुयोग्य व्यक्ति समाज को परिष्कृत पीढ़ी देने के लिए अपने को समर्थ मानते हों, सन्तान पैदा करें पर हर कोई दीन दुर्बल अपनी मूर्खता का दण्ड समस्त समाज को, अबोध बच्चों को, असमर्थ नारी को भुगतने के लिये उतारू हो जाय तो उसे एक घिनौनी दुष्टता ही कहा जायेगा। समय आ गया कि हम विवेक को जागृत करें और मूढ़ता के प्रवाह में बहते हुए चले जाने की अपेक्षा हर बात परगुण-अवगुण और उचित अनुचित की दृष्टि से विचार करें। समय आ गया कि हम परम्पराओं के स्थान पर विवेक एवं दूरदर्शिता का सहारा लें और उतना साहस जगायें जिसके आधार पर अवांछनीय के लिए इन्कार किया जा सके और जो उचित हो उसे ही अपनाने का पराक्रम दिखाया जा सके।

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    अनुक्रम

  1. सर्वशक्तिमान् परमेश्वर और उसका सान्निध्य

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