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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोगश्रीराम शर्मा आचार्य
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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग
प्रजनन का पाशविक आकर्षण हो सकता है पर विवेक के द्वारा उसका समाधान किया जाना चाहिए। उसकी क्षतियों पर विचार किया जाना चाहिए और यह देखा जाना चाहिए कि दो-पाँच मिनट के उन्माद के वशीभूत होकर हम कितने जाल-जंजाल अपने लिए तैयार कर रहे हैं और उस बीज से उत्पन्न होने वाली शाखा-प्रशाखाओं एवं समस्या उलझनों का विस्तार कितना बड़ा है। साथी, सहचर, धर्मपत्नी, धर्मपति, अर्धाङ्गिनी, जीवनसङ्गी की बात सोचना इस पाप-पाखण्ड और स्वार्थ संकीर्णता के जमाने में व्यर्थ है। काम लिप्सा की पिशाचनी ही सर्वत्र नङ्गा नाच कर रही है। एक दूसरे से लाभ उठाने की होड़ दाम्पत्य जीवन में इतनी निकृष्ट स्तर पर चली जाती है कि चारों ओर फैले हए पग-पग पर देखे जाने वाले उदाहरणों को देखकर यही जंचता है कि प्रजनन के प्रलोभन को मछली के काँटों की तरह यों ही नहीं निगल जाना चाहिए वरन् कुछ आगापीछा भी सोचना चाहिए।
प्रलोभनों में वासनाओं और तृष्णाओं के जंजाल भी कम विकट नहीं हैं। मिथ्या अहंकार प्रदर्शित कर एक दूसरे पर रौब जमाने की प्रवृत्ति कितनी विडम्बना भरी, कितनी कृत्रिम, कितनी उपहास्यास्पद और कितनी खर्चीली है उसे देखते हुए आश्चर्य होता है कि आखिर लोगों ने उसे किसलिये अपना लिया?
फैशन, पोशाक, सजावट श्रृंगार के खर्चीले उपकरण लोग इसलिए जुटाते हैं कि लोग उन्हें अमीर मानें। समझा जाता है कि अमीरी में ही सम्मान है। सम्मान की भूख बुझाने के लिए लोग अपने साधनों का प्रदर्शन करते हैं। यह कितनी बचकानी और ओछी समझ है। सम्मान सद्गुणों और अनुकरणीय सत्कर्मों का होता है। नाटकीय श्रृंगार से सजे हुए बहरुपिये अपने मन को धोखा भले ही दे लें। हर समझदार आदमी उनके औछेपन पर व्यङ्ग ही करेगा और उपहास की दृष्टि से ही देखेगा। नामवरी के लिए गुण्डागर्दी की, फिजूलखर्ची की, अमीरी का ढोंग बनाने की बात जिन्हें सूझती है वे समझदारों की-समझदारी की दुनिया से बहुत दूर हैं यही कहना चाहिए। कोई नासमझ ही उनके झाँसे पट्टी से प्रभावित हो सकता है, जिसमें असलियत समझने की क्षमता है उसे इस प्रकार की विडम्बना बनाने वाले का घटिया स्तर समझने में देर न लगेगी।
स्मरण रखा जाना चाहिए अगले ही दिनों अमीरी किसी की प्रशंसा का कारण नहीं रहेगी वरन् जो जितना मालदार होगा उसे उतना ही घुणित, निष्ठुर एवं दुष्ट माना जायेगा। विवेक पूछेगा जब उसके पास इतना उपार्जन था तो समाज के पिछड़ेपन को दूर करने में उसे खर्च क्यों न कर सका? प्यासी मानवता की आवश्यकतायें इसकी आँख से ओझल कैसे रहीं? अभाव और आवश्यकता से विकल समाज का सदस्य रहते हुए भी एकाकी गुलछर्रे उड़ाने की बात इसके गले कैसे उतरी? यह प्रश्न दिन-दिन उभरते चले जायेंगे और कुछ ही दिनों में लोग अमीरी को उतनी ही घृणित समझेंगे जितनी डकैती को। इसलिए बड़प्पन के लिए अमीरी बढ़ाने या उसका आडम्बर बनाने की बात समय से पहले ही दिमाग में से निकाल देनी चाहिए। यह नशा सम्मान का नहीं अपमान का कारण बनता जा रहा है।
क्या करें, क्या न करें? इस प्रश्न पर हमें हजार बार सोचना चाहिए। हमारी जीवन की दिशा और कार्य पद्धति क्या हो, इस लक्ष्य पर लाख बार विचार करना चाहिए। यह प्रश्न व्यर्थ के नहीं हैं। इन्हें गौण नहीं माना जाना चाहिए। वरन् बुद्धिमत्ता की सर्वोपरि चुनौती के रूप में उन समस्याओं का हल और समाधान खोजना चाहिए। बारबार कसौटी लगाकर जाँचना चाहिए कि क्या हमारी आकांक्षायें, अभिरुचियाँ, प्रवृत्तियाँ और गतिविधियाँ खरी हैं या नहीं? यदि वे खोटी हैं तो इतना साहस इकट्ठा करना चाहिए कि उन्हें बदलें। यदि वे अनुपयुक्त हैं तो इतना पराक्रम सजग करना ही चाहिए कि प्रवाह में बहते जाने की व्यर्थता के विरुद्ध पैर जमा कर खड़े हो सकें।
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