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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोगश्रीराम शर्मा आचार्य
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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग
मानवीय बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता की पुकार है कि नर तन की महानता और जिम्मेदारी को समझा जाय। इस अनुपम सौभाग्य और सुअवसर के साथ मखौल, दिल्लगीबाजी न की जाय वरन् उसका समुचित लाभ उठाया जाय। भगवान् ने हमें जो दिया है उस पर सन्तोष करें, असन्तोष की आग भड़का कर अकारण दिन-रात अपने जलने की चिता न सजायें। जो मिला है उस पर मोद मनायें और उसके सदुपयोग की बात सोचें। सृष्टि के समस्त प्राणियों की तुलना में हमारी उपलब्धियाँ सहस्रों गुनी अधिक है। भूलना न चाहिए कि इस धरोहर के पीछे एक अत्यन्त महान् जिम्मेदारी छिपी हुई है। मनुष्य भगवान् के सहयोगी के रूप में पैदा किया गया है और उसे इतने बड़े अनुदान इसलिए दिये गये हैं कि सष्टि को अधिक सुखी, अधिक सुन्दर और अधिक समुन्नत बनाने में अधिकाधिक हाथ बटायें-अधिकाधिक योगदान करें। भगवान् की पूजा उपासना के समस्त कर्मकाण्ड इसी उद्देश्य के लिए विनिर्मित हुए हैं कि मनुष्य की प्रसुप्त अन्तः चेतना अपने स्वरूप लक्ष्य एवं कर्त्तव्य को समझकर ईश्वरीय इच्छा की अनुगामिनी बन सके। यही तत्त्वज्ञान ईश्वरीय प्रसन्नता का आधार है और इसी स्तर की गतिविधियाँ अपनाने से जीवन लक्ष्य की पूर्ति सम्भव हो सकती है।
आज की विश्वव्यापी अव्यवस्था और दुष्प्रवृत्तियों की व्यापकता हमें पुकारती और झकझोरती है कि प्रसुप्त न पड़े रहें, मूर्छित न रहें। बाल-क्रीड़ा में न उलझें। जब कि आपत्ति काल सामने मुँह बाए खड़ा है और मानव सभ्यता सर्वनाश के कगार तक जा पहुँची है, तब तो हमें सजग होना ही चाहिए और अपनी आत्मिक जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए कछ ऐसा करना ही चाहिए जो मानवीय चेतना के उपयुक्त एवं अनुरूप है। युग परिवर्तन की महान् सन्ध्या बेला में यदि हम उपेक्षा और तटस्थता ही अपनाये रहें तो युग धर्म की दृष्टि से हम से प्रबुद्ध व्यक्तियों के लिए ऐसा अक्षम्य अपराध बन जायेगा जिसका समाधान करोड़ों जन्मों तक प्रायश्चित की आग में जलते रहने पर भी पूरा न हो सकेगा। अबोध को क्षमा मिल सकती है। पर जो जानकर भी अनजान रहने का बहाना बनाये, जो स्थिति की विषमता समझते हुए भी उपेक्षा करते, जो आत्मा की पुकार को भीरुता के मूसल से कुचलता रहे ऐसा आत्म-हत्यारा अनन्त काल तक आत्म-ग्लानि के रौरव नरक में जलते रहने का ही अधिकारी बनेगा।
हम पेट और प्रजनन की लिप्सा-लोलुपता को निरस्त करें। तृष्णा वासना के जाल-जंजालों में ही उलझने, बँधने में अपना सर्वनाश न सँजोते रहें। वरन् साहस करके अपनी विचारणा और गतिविधि बदलें। शरीर के उत्तरदायित्वों को निबाहें पर आत्मा की पूर्णतया उपेक्षा न करें।
अपना विवेक जगना ही चाहिए और वह साहस उत्पन्न होना ही चाहिए जो निकृष्ट स्तर का जीवनयापन असम्भव कर दे और महानता का अवलम्बन करने के लिए इतना अदम्य उत्साह पैदा करे जो हर प्रलोभन और अवरोध को कुचलता हुआ जीवन लक्ष्य की पूर्ति में प्रवृत्त कर सके, उसी परिवर्तन में हमारा, हमारे समाज और युग का हित एवं कल्याण सन्निहित है।
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