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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोगश्रीराम शर्मा आचार्य
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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग
मरण सृजन का अभिनव पर्व
मृत्यु हमारा सबसे अधिक प्रिय पात्र और शुभ चिन्तक अतिथि है। उसके आगमन पर डरने घबराने जैसी कोई बात है नहीं। शरीर जब आयु की अधिकता से जीर्ण-शीर्ण हो जाता है, अवयव अपना कर्तव्य निबाहने में असमर्थ बन जाते हैं, मरम्मत की चिन्दियाँ भी जब काम नहीं करती तब नया यन्त्र लगाने की जरूरत पड़ती है। इसी परिवर्तन का नाम मृत्यु है।
कारखानेदार पुरानी मशीनें हटाते हैं, पुरानी मोटरें बेचते रहते हैं और उनके स्थान पर नई मोटर लगाते हैं। इससे कुछ असुविधा नहीं होती, सुविधा ही बढ़ती है। पुरानी मशीन आये दिन गड़बड़ी फैलाती थी, पुरानी मोटर धीमे-धीमे और रुक-रुक कर चलती थी। नई लग जाने से वह पुराची अड़चनें दूर हो गईं। नई के द्वारा बढ़िया काम होने लगा। जीर्णता के साथ कुरूपता बढ़ती है और नवीनता में सौन्दर्य रहता है। पुराने पत्ते रूखे शुष्क और कठोर हो जाते हैं जबकि नई कोपलें कोमल और सुन्दर लगती हैं। पुराने पत्ते झड़ने पर, पुरानी मशीन उखड़ने पर-पुरानी मोटर बिकने पर कोई इसलिये रंज नहीं मनाता कि अगले ही दिन नवीन की स्थापना सुनिश्चित है।
आत्मा अनादि और अनन्त है। वह, ईश्वर जितना ही पुरातन है और कभी नष्ट न होने वाला सनातन है। उसकी मृत्यु सम्भव नहीं। शरीर का परिवर्तन स्वाभाविक ही नहीं, आवश्यक भी है। हर पदार्थ का एक क्रम है जन्मना-बढ़ना और नष्ट होना। नष्ट होना एक स्वरूप का दूसरे स्वरूप में बदलन भर है। यदि यह परिवर्तन रुक जाय तो मरण तो बन्द हो सकता है जन्म की भी फिर कोई सम्भावना न रहेगी। यदि जन्म का उल्लास मनाने की उत्कण्ठा है तो मरण का वियोग भी सहना ही होगा। वधू अपने माँ-बाप से बिछुड़ कर सास श्वसुर पाती है, सहेलियों को छोड़कर पति को सहचर बनाती है। यदि मैका छोड़ने की इच्छा ही न हो तो फिर ससुराल की नवीनता कैसे मिलेगी?
पीतल के पुराने बर्तन टूट जाते हैं तब उस धातु को भट्टी में गला कर नया बर्तन ढाल देते हैं। वह सुन्दर भी लगता है सुदृढ़ भी होता है। पुराने टूटे, चूते-रिस्ते, छेद, गड्ढे और दरारों वाले शरीर बर्तन को चिता की भट्ठी में गलाया जाना तो हमें दीखता है पर उसकी ढलाई की फैक्टरी कुछ दूर होने से दीख नहीं पड़ती है। सोचते हैं पुराना बर्तन चला गया। खोज करने से विदित हो जायेगा कि वह गया कहीं भी नहीं-जहाँ का तहाँ है सिर्फ शकल बदली है।
पुराने मकान टूट फूट जाते हैं उन्हें गिरा कर नया बनाना सुरक्षा और सुविधा की दृष्टि से आवश्यक है। नया बनाने के लिए जब पुराना गिराया जा रहा होता है तो कोई रोता कलपता नहीं। शरीर के मरने पर फिर दुःखी होने का क्या कारण है?
बहुत दिन साथ रहने पर बिछुड़ने का कष्ट उन्हें होता है जिनकी ममता छोटी है। कुछ ही चीजें जिन्हें अपनी लगती हैं-कुछ ही व्यक्ति जिन्हें अपने लगते हैं वे प्रियजनों के बिछोह की बात सोचकर अपनी संकीर्णता का ही रोना रोते हैं। वस्तुत: कोई किसी से कभी बिछुड़ने वाला नहीं है, समुद्र में उठने वाली लहरें जन्मती और मरती भर दीखती हैं पर यथार्थ में समुद्र जहाँ का तहाँ है। कोई लहर कहीं जाती नहीं-सागर का समग्र जहाँ का तहाँ परिपूर्ण रहता है। कुछ समय के लिये बादल बन कर उड़ भी जाय तो नदियों के माध्यम से फिर अगले क्षण उसी महाजलाशय में आकर कल्लोल करता है। मरने के बाद भी कोई किसी से नहीं बिछुड़ता। सूर्य की किरणों की तरह हम सब एक ही केन्द्र में बँधे हुए हैं। कुछेक प्राणी ही हमारे हैं अन्य सब बिराने हैं इस सीमा बद्धता से ही हमें शोक होता है।
मृत्यु का अर्थ है कुरूपता का सौन्दर्य में परिवर्तन। अनुपयोगिता के स्थान पर उपयोगिता का आरोपण। इससे डरने का न कोई कारण है और न रुदन करने का।
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