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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग

आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :168
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4164
आईएसबीएन :0000

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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग

मृत्यु का सदा स्मरण रखें ताकि उससे डरना न पड़े


मृत्यु के विषय में निश्चित सभी होते हैं किन्तु निश्चिन्त कदाचित कोई-कोई ही होते हैं। वैसे मृत्यु की चिन्ता सभी को होती है।

मृत्यु की चिन्ता न करने वालों में वे ही बोधवान सत्पुरुष होते हैं जो उसके सम्मुख उपस्थित होने की तैयारी करते रहते हैं। इस अनायास आने वाली घटना का स्मरण रखने वाले व्यक्ति अपने जीवन का एक क्षण भी बरबाद नहीं करते। अपने जीवन के प्रत्येक कर्तव्य को तत्परता से पूरा करने में लगे हुए, इस बात का प्रयत्न किया करते हैं कि वे मृत्यु आने से पूर्व ही अपने सारे कर्तव्यों को पूरा कर डालें, जिससे कि उस समय किसी कर्तव्य का उत्तरदायित्व अपूर्ति की दशा में दबाव न डाल सके।

जिस प्रकार कर्त्तव्य परायण व्यक्ति जीवन में असत्कर्मों से बचा रहता है, उसी प्रकार कर्त्तव्यहीन व्यक्ति अकर्मों में ही लगा रहता है। असत्कर्मों द्वारा पाप का संचय करते रहने वाले व्यक्ति का मृत्यु से भयभीत होना स्वाभाविक ही है। वह जानता है कि जिस समय मृत्यु आकर उपस्थित होगी उस समय जीवन भर किये पापों के चित्र सामने आ जायेंगे जिससे पश्चाताप की भयानक अग्नि में जलना होगा। एक असहनीय यन्त्रणा के बीच शरीर का अन्त होगा। तब ऐसा कोई अवकाश शेष न रह जायेगा जिसमें उन असत्कर्मों का ताप सत्कर्मों से कम किया जा सके। यन्त्रणा के बीच गर्हित अन्त होने से शरीरोपरान्त प्राप्त होने वाली गति भी गर्हित होगी, जिसे पता नहीं कितने युगों तक भोगना पड़े। इस भयानक सम्भावना से अकर्तव्यवान का भयभीत होना स्वाभाविक ही है।

मनुष्य जीवन का एक एक क्षण अमूल्य है। यह धर्म, अर्थ, काम-मोक्ष आदि पुरुषार्थों को प्राप्त कर लेने का सुअवसर है। केवल मनुष्य शरीर ही ऐसा साधन है जिससे भगवत्-प्राप्ति का उपाय किया जा सकता है। अन्य सारी योनियाँ भोग योनियाँ हैं। उनमें भगवत्-प्राप्ति का उपाय नहीं किया जा सकता। इसको प्रमादवश नाना प्रकार के नरकदायक भोगों में नष्ट कर देना बहुत बड़ी हानि है।

जीवनकाल में जिन कार्यों, संस्कारों तथा प्रवृत्तियों को अभ्यास द्वारा प्रमुख बनाया जाता है वही मृत्यु के समय चलचित्र की तरह मनुष्य के सम्मुख चक्कर लगाया करते हैं। उस समय मनुष्य उस स्मरण की भीड़भाड़ में अपने सत्कर्मों को ढूँढ़ने का प्रयत्न किया करता है। यदि उसने सुकृत्य किये रहे होते हैं तो वे उसके स्मृति-पटल पर आकर मित्र की तरह उसे सहारा दिया करते हैं। जिससे अनन्तपथ के यात्री को बड़ी सान्त्वना मिलती है और वह सुख-शान्ति पूर्वक शरीर त्याग कर सदाचार के अनुसार सुन्दर लोक की प्राप्ति करता है।

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    अनुक्रम

  1. सर्वशक्तिमान् परमेश्वर और उसका सान्निध्य

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