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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग

आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :168
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4164
आईएसबीएन :0000

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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग


मृत्यु मानों छुट्टी मनाना है। लोग अपने काम से छुट्टी लेकर नदी, समुद्र में गोता लगाने, सैर सपाटे करने जाते हैं। मृत्यु के द्वारा भी हम अनन्त जीवन के समुद्र में गोते लगाने एक सुरम्य प्रदेश की यात्रा करने जाते हैं जिसकी कल्पना भी हम नहीं कर पाते। मरण एक महायात्रा है, महाप्रस्थान है, महानिद्रा है। जीवन और जगत् के कार्य व्यापार से विरत होकर एक लम्बी छुट्टी बिताना है।

गीताकार ने मृत्यु को वस्त्र बदलना बतलाया है। जिस तरह फटे जीर्ण शीर्ण वस्त्र को उतार कर हम नया वस्त्र धारण करते हैं उसी तरह मृत्यु भी जीर्ण जर्जर, असमर्थ अशक्त शरीर को छोड़कर पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है। प्रकृति माता मनुष्य को मृत्यु के रूप में बुलाती है, नये वस्त्र पहनाकर फिर भेज देती है।

छत पर पहुँचने के लिये सीढ़ियों पर होकर जाना पड़ता है। जीवन के परम लक्ष्य की पूर्णता प्राप्ति तक जाने के लिये भी हमें जन्म मरण के सोपानों पर से गुजरना पड़ता है। मरण मानों वर्तमान सीढ़ी से आगे की सीढी पर पहँचने के लिये पैर उठाना है, जन्म मानों सामने वाली सीढ़ी का आधार लेकर ऊपर पहुँचने की तैयारी करना है।

व्यापारी अपनी दुकान में तरह-तरह का सामान रखता है और बेचने खरीदने का क्रम रात दिन जारी रखता है लेकिन साल में एक बार कुछ समय के लिये वह खरीद-फरोख्त का काम बन्द करके अपने सामान का चिट्ठा बनाता है। क्या खरीदा क्या बेचा और कितना लाभ कमाया? ऐसा हिसाब प्रत्येक व्यापारी वर्ष में एक बार लगाता है। मृत्यु भी मानों जीवन के हिसाब किताब और लाभ पर विचार करने का अवसर है कई वर्षों से चल रहे जीवन व्यापार का आखिर कभी तो हिसाब होना ही चाहिए और मृत्यु ही ऐसा अवसर है जब हम अपने लाभ हानि पर विचार करके फिर से दुकान लगाने एवं भूल सुधारने का कार्य सम्पन्न करते हैं।

मृत्यु मानों भगवान् का निमन्त्रण है। विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा है-- "मृत्यु तो प्रभु का आमन्त्रण है। जब वह आये तो उसका द्वार खोलकर स्वागत करो, चरणों में हृदय धन सौंप कर प्रभु का अभिवादन करो।" माता जब श्रावण में अपनी बेटी को उसकी ससुराल से बुलाती है तो बेटी के हृदय में कितनी प्रसन्नता उत्सुकता पैदा होती है। उसका हृदय भी माता के यहाँ जाने के लिए सावन के बादलों की तरह उमड़ने लगता है। पीहर जाकर वह स्वतन्त्रता के साथ आनन्द उल्लास का जीवन बिताती है। मृत्यु भी मानों महा-माता द्वारा अपने घर बुलाने के लिये निमन्त्रण होता है हमारे लिए।

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    अनुक्रम

  1. सर्वशक्तिमान् परमेश्वर और उसका सान्निध्य

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