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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोगश्रीराम शर्मा आचार्य
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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग
मृत्यु जीवन का एक बहुत ही आवश्यक और अनिवार्य अङ्ग है। यदि मृत्यु न हो तो यह जीवन भार बन जाय। यह संसार काँटों की तरह चुभने लगे। हीन से हीन व्यक्ति में भी जीने की जो चाह है वह मृत्यु की कृपा से ही है। मृत्यु को हटा दीजिए जीवन से लोग ऊबने लगेंगे। यदि मृत्यु का अस्तित्व न रहे तो कल्पना कीजिए कि उन लोगों का क्या हो जो अनेकों कष्ट पा रहे होते हैं। रोग, शोक, अभाव, कठिनाइयों की असह्य मार से मृत्यु देवता ही तो बचाता है। जीर्ण, शीर्ण, परावलम्बी असमर्थ, वृद्ध शरीर से छुटकारा मरण देवता ही दिलाते हैं। शारीरिक असमर्थता के कारण परावलम्बी हो जाने वाले लोगों का मुक्तिदाता, असाध्य रोगों से ग्रस्त लोग जिनकी कोई चिकित्सा नहीं हो सकती, उनका धन्वन्तरि, परम दयालु मृत्यु देवी ही है। संसार जिन्हें ठुकरा देता है समय जिनके आनन्द खुशी को छीन लेता है उन्हें मौत ही अपने अङ्क में बिना किसी भेद भाव के स्थान देती है।
जीवन के कडुवे मीठे जीवन घूंट यदि आदमी एक लम्बे समय तक संजोये रखे तो वह उनके बोझ से दब जाय। अधिक नहीं एक जीवन की घटनाओं, बातों, अनुभूतियों को याद रखा जाय तो उनके विशाल बोझ से मनुष्य परेशान हो उठे, जीवन असह्य हो जाय। लेकिन मृत्यु का विधान इन सबको भुलाने के लिए ही प्रकृति माता का एक वरदान मिला है। मौत के दरवाजे पर आकर हमें जीवन की समस्त अच्छी बुरी स्मृति, अनुभूतियाँ, घटनायें विस्मरण हो जाती हैं। उन्हें नये संसार की यात्रा पर जाने से पूर्व ही इसी दुनिया के साथ छुटा देती है, मृत्यु देवी। बहुत-सी ऐसी अच्छी बुरी घटनायें जिनकी याद मनुष्य भुला देना चाहता है लेकिन जीते जी वह स्वभाववश और दुनिया वालों के कारण उन्हें भुला नहीं पाता और उनकी उधेड़-बुन में परेशान रहता है, मृत्यु ही उसे सरलता से इनके जंजाल से छुटकारा दिला देती है।
मृत्यु से ही इस संसार में सौन्दर्य का आकर्षण बना हुआ है। इसी के कारण प्रेम है। यदि मृत्यु न होती, सब अमर होते तो एक दूसरे की तरफ स्नेह भरे हृदय से देखते भी नहीं। कठोरता, रूखापन, फैल जाता। कोई किसी को अपना नहीं कहता। बहुत बार बुराइयों से लोग इसलिए बचे रहते हैं कि उन्हें मृत्यु का, अपनी छोटी-सी जिन्दगी का ख्याल हो आता है और इस तरह संसार में अनेक बुराइयाँ पनप ही नहीं पातीं। यदि मनुष्य अमर हो जाय तो कुछ भी करने में नहीं चूके। यदि मनुष्य के पाँव कहीं रुकते हैं तो मौत के दरवाजे पर।
मृत्यु मनुष्य के लिए त्याग उत्सर्ग का पाठ सिखाती है। साथ ही अनासक्त होने का व्यावहारिक प्रयोग है यह। मनुष्य जीवन भर वस्तु व्यापार में लीन रहता है। इनका इस तरह संग्रह करता है मानो उसे सदा-सदा इसी धरती पर रहना है। नीति अनीति जैसे भी बने कमाने, संग्रह करने, सुख साधन जुटाने में ही हमारा जीवन लगा रहता है लेकिन मौत आती है और चुपके से हमें अपने अज्ञात हाथों में उठा लेती है। सब कुछ यहीं धरा रह जाता है। छोड़ देना पड़ता है। लेकिन मृत्यु कोई कठोरता-क्रूरता नहीं है जो बलपूर्वक मनुष्य को यह त्याग कराती है। वरन् यह तो मङ्गलकारिणी है जो अनेक आसक्ति, मोह तुष्णा के दलदल में फँसे मनुष्य को निकाल कर उसे मुक्त करती है। जगत् के वस्तु पदार्थों के सङ्ग से लगे कल्मषों को मृत्यु माता ही अपने हाथों से धोती है उन्हें छुड़ा देती है ठीक उसी तरह जैसे कोई माँ अपने बच्चे के शरीर में लगी गन्दगी को साफ करती है।
हमारे यहाँ मृत्यु को विश्राम, निद्रामात्र समझा जाता है मृत्यु पर भी हमारे यहाँ जन्म की तरह खुशियाँ मनाने, जुलूस निकालने, कीर्तन गान करने आदि का विधान है। सोया हुआ बालक फिर उठकर अपने खिलौने से खेलने लगता है। मृत्यु के बाद फिर से हम नया जीवन शुरू करते हैं। पिछले जीवन में जहाँ अध्याय छोड़ा था उससे आगे नये अध्याय का प्रारम्भ फिर करते हैं। रात को अधबुनी चादर छोड़कर सो जाने वाला जुलाहा दूसरे दिन फिर वहीं से अपनी चादर बुनना शुरू करता है जहाँ उसने छोड़ी थी। पूर्व जन्म के ज्ञात संस्कार स्वभाव आदि की कमाई नये जन्म में फिर से मिल जाती है इस तरह मौत सबकी समाप्ति नहीं है अपितु शरीर रूपी साधन को दुरुस्त करके नये उत्साह, नई शक्ति से मंजिल की ओर गतिशील होने की प्रक्रिया है मौत।
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