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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग

आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :168
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4164
आईएसबीएन :0000

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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग

अमृत और उसकी प्राप्ति


मृत्यु इस संसार में किसी भी जीव को शायद जितना दुःख देती है उतना अन्य कोई वस्तु नहीं। धन और साधन सम्पन्न मनुष्य, नाग, यक्ष, किन्नर, गन्धर्व, भूत और बैताल तक मृत्यु की कल्पना से काँपते पाये जाते हैं। युग के युग बीते, असंख्यों व्यक्तियों ने असंख्यों तरीकों से अनुसन्धान किये पर इस समस्या का कोई समाधान न निकला। जन्म लेने वाले जीव को मृत्यु से कदापि न बचाया जा सका। आधुनिक विज्ञान का आविर्भाव भी इसी परिकल्पना पर आधारित है। विज्ञान के समुद्र मन्थन से अनेक प्रकार के तत्व, रत्न और विविध आश्चर्य आविष्कृत हुये किन्तु अमृतत्व की कहीं से भी उपलब्धि न हो सकी। मृत्यु से छुटकारा पाने का कोई स्थूल साधन आज तक न ढूँढ़ा जा सका। इस दुःख से जीव को किसी भांति उन्मुक्त न किया जा सका।

तो भी संसार के प्रत्येक धर्म ने एक ऐसे तत्व की बात स्वीकार की है जिसे पाकर मनुष्य अमृत-पद पा लेता है, उसे मृत्यु के भय से छुटकारा मिल जाता है। ऋषियों ने अमृत तत्व को एक दैवी पेय पदार्थ के रूप में माना है। पौराणिक कथा, कहानियों और उद्धरणों के अतिरिक्त वेद और उपनिषदों में भी कई स्थानों में 'अमृत' शब्द प्रयुक्त हुआ है। ऐसे सभी स्थल यह व्यक्त करते हैं कि अमृत कोई ऐसा तत्व है जिसके द्वारा मृत्यु से छुटकारा मिल सकता है। अमृत पान करने की वस्तु है या कोई आध्यात्मिक तत्व है तथा उसके पान करने से मृत्यु से छुटकारा मिल जाता है या नहीं-यह यहाँ विवेचना का विषय है।

पुराणों में एक कथा आती है-एक आर देवताओं तथा असुरों ने समुद्र का मन्थन किया। इस मन्थन से जो चौदह रत्न मिले अमृत भी उनमें एक था। बाद में देवताओं ने उसे पान किया और वे अमर हो गये।

समुद्र का मन्थन किया जाना और उससे कोई अमृत जैसा दृव्य पेय प्राप्त किया जाना—यह बात कुछ अजीब-सी लगती है। इतने बड़े समुद्र को मथा जाना ही असम्भव लगता है फिर उससे जो चौदह रत्न प्राप्त हुए वह भी ऐसे हैं जिन पर कोई सहसा विश्वास नहीं होता। पर उक्त पौराणिक आख्यानों की गहराई में प्रवेश किया जाय तो मालूम पड़ता है कि इन कथानकों के द्वारा शास्त्रकारों ने सूक्ष्म आध्यात्मिक तत्त्वों का अलंकारिक विशेषण किया है। अमृत को जिस रूप में पुराणों में वर्णित किया गया है वह उस तत्व का केवल कवित्वमय चित्रण है पर उसमें जो जीवन दर्शन सन्निहित है वह अवश्य ही बहुत महत्वपूर्ण है। इस अलंकारिक विवेचन की वास्तविकता को जानने के लिए उपनिषदों का अध्ययन आवश्यक है। अमृत की व्याख्या उपनिषदों में जिस रूप में की गई है भारतीय संस्कृति का निरूपण उसी को आधार मान कर किया गया है।

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    अनुक्रम

  1. सर्वशक्तिमान् परमेश्वर और उसका सान्निध्य

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