लोगों की राय

आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग

आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :168
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4164
आईएसबीएन :0000

Like this Hindi book 6 पाठकों को प्रिय

111 पाठक हैं

आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग


अमृतत्व आध्यात्म-धर्म का प्रमुख आधार है और उसी की प्राप्ति को मनुष्य जीवन का लक्ष्य भी बताया गया है। किन्तु वह किसी तरल पेय पदार्थ के रूप में नहीं है वरन् विशुद्ध आध्यात्मिक तत्व के रूप में हुआ है जिसका अवगाहन कर मनुष्य का स्थूल शरीर भले ही अमर न होता हो किन्तु यह निश्चित है कि वह जिस उद्देश्य को लेकर धरातल में अवतरित होता है उसे अवश्य पूर्ण कर लेता है। इसे ही आत्म-कल्याण, स्वर्ग या मुक्ति की, परमानन्द की प्राप्ति कह सकते हैं। जिस तत्व को प्राप्त कर जीव शाश्वत सुख में लीन हो जाता है उसे ही अमृत तत्व के नाम से पुकारा जाता है।

वह तत्व क्या है-कठोपनिषद् (२/२/८) में इसकी व्याख्या की गई है। शास्त्र कार ने यम के मुख से नचिकेता के लिए जो उपदेश कराया है-उसमें कहा है-

य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं, कामं पुरुषो निर्मिमाणः।
तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म, तदेवामृतमुच्यते॥


अर्थात्-यह परमात्मा ही प्रलय काल में भी जागृत रहता है। जीव के लिए कर्मानुसार भोग का निर्माण करने वाला भी वही है। वह शुक्र है, वह ब्रह्म है उसे ही अमृत के नाम से पुकारा जाता है।"

इस शोक से सिद्ध होता है कि परमात्मा ही वह अविनाशी तत्व है जिसे प्राप्त करने से मनुष्य जीवन का उद्देश्य पूरा किया जा सकता है।

मुण्डकोपनिषद् (२/२/२) में इसे और भी स्पष्ट करते हुये बताया है-

यदर्चिमद्यदणुभ्योऽणु च, यस्मिल्लोको निहिता लोकिनश्च। तदेतदक्षरं ब्रह्म स प्राणस्तदु वाड्मनः तदेतत्सत्यं तदमृतं तद्वद्ध सोम्य विद्धि॥

अर्थात्-हे सौम्य! तू उस बेचने के योग्य लक्ष्य को बेध डाल, जो तेजस्वी सूक्ष्मातिसूक्ष्म और लोकों में निवास करने वाले प्राणियों का आश्रय है, वही अविनाशी ब्रह्म है, मन,वाणी, प्राण सत्य और अमरत्व से युक्त है।"

यहाँ परमात्मा के "अमृत-तत्व" होने की बात को पुष्ट करते हुए शास्त्रकार ने यह भी सिद्ध किया है कि वह प्राण है, सत्य है, मन और वाणी है। इन सन्दर्भो से यह स्पष्ट हो जाता है कि वह मनुष्य के भौतिक स्वरूप को अमृत नहीं करता वरन् जीवात्मा की स्थिति को इतना ऊँचे उठा देता है कि जीव का हलकापन नष्ट हो जाता है और उसे अपने आनन्दमय, अविनाशी स्वरूप का बोध हो जाता है। उपरोक्त सूक्त में शास्त्रकार ने आदेश दिया है कि यदि तुम उस अमरत्व को प्राप्त करना चाहते हो तो हे सौम्य ! उस परमात्मा की शरणागति प्राप्त करो।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

    अनुक्रम

  1. सर्वशक्तिमान् परमेश्वर और उसका सान्निध्य

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book