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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोगश्रीराम शर्मा आचार्य
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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग
ब्रह्मामृत की उपलब्धि के साधन पर प्रकाश डालते हुए केनोपनिषद् में विवेचन किया है-
आत्मना विन्दते वीर्य, विद्यया विन्दतेऽमृतम्। (२-४)
अर्थात्-"परमात्मा से प्रकट हुआ ज्ञान ही यथार्थ है, क्योंकि इसके द्वारा ही अमृतत्व की प्राप्ति होती है। आत्मा से परमात्मा को जानने की प्रेरणा प्राप्त होती है और ज्ञान से अमृत स्वरूप ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।"
हमारे महापुरुष सदैव इस बात पर जोर देते आये हैं कि मनुष्य ज्ञानवान् बनें। विद्या को मनुष्य का आभूषण बताया और कहा है कि ज्ञान ही तुम्हें बन्धन से मुक्त करेगा और अमृतत्व प्रदान करेगा पर उन्होंने यह बात भी स्पष्ट कर दी कि यह विद्या लौकिक नहीं हो सकती। यथार्थ विद्या ब्रह्म विद्या है। उसका मनन करने से आत्मा के रहस्य ज्ञात होते हैं, वास्तविक रूप का ज्ञान होता है और यह ज्ञान ही मनुष्य को सृष्टि के आदि कारण परमात्मा को जानने की प्रेरणा प्रदान करता है।
आत्मा और परमात्मा विद्या के विशुद्ध ग्रहणीय स्वरूप का और भी विवेचन ईशोपनिषद् में हुआ है -
विद्या चाविद्यां च यस्तद् वेदोयः सह। अविद्यया मृत्युं तीर्वा, विद्ययाऽमृतमश्नुते॥ (११ वाँ मन्त्र)
अर्थात्-"जो मनुष्य विद्या रूप ज्ञान तत्व और अविद्या रूप कर्म तत्व को साथ ही साथ जान लेता है, वह कर्मों के अनुष्ठान से मृत्यु को पार कर ज्ञान के अनुष्ठान से अमृतत्व का उपभोग करता है।"
उपनिषद् के यह सभी प्रकरण अमृत-तत्व के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं पर साथ ही मनुष्य को भूल न होने देने के लिये यह भी आगाह कर देते हैं। अमृत मौलिक, अर्थ में मृत्यु से छुड़ाने वाला पदार्थ है पर मृत्यु को आध्यात्मिक रूप में शरीर का बारम्बार विनाश मानकर जीव के अज्ञान को मानना पड़ेगा। क्योंकि जब तक अज्ञान रहता है तब तक मनुष्य के सारे क्रियाकलाप स्थूल भोगों तक ही सीमित रहते हैं। विषय भोगों के प्रति आसक्ति मनुष्य से पाप कराती है और बार-बार कर्मानुसार मृत्यु पाता है, पुनर्जन्म लेता है। जब तक यह स्थिति चलती रहती है तब तक उसके दुःख नष्ट नहीं होते।
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