|
आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोगश्रीराम शर्मा आचार्य
|
111 पाठक हैं |
||||||
आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग
इस साधारण पक्ष के साथ-साथ मृत्यु के सम्बन्ध में एक अधिक गहरा और सत्य पक्ष भी है। जो इसका दार्शनिक पक्ष कहा जाता है। मनुष्य का जीवन दो तत्वों से मिलकर बना है। शरीर और उसमें निवास करने वाली चेतना। जीवन के चेतन-तत्त्व ही वास्तव में हम हैं। यह मृक्तिका पिंड तो उस चेतन की अभिव्यक्ति माध्यम मात्र है। उसका वाहन भर ही है। रथ में बैठकर चलने वाला मनुष्य यदि स्वयं को रथ मान ले तो उसके नष्ट हो जाने पर मनुष्य को स्वयं अपने को ही नष्ट मान लेना चाहिए। किन्तु ऐसा होता कहाँ है। रथ अथवा वाहन के नष्ट हो जाने पर भी उसका रथी अथवा सवार यथावत बना ही रहता है। हाँ जब उसको अपने वाहन के प्रति अनुचित ममता हो जाती है उसे ही अपना अस्तित्व एवं सर्वस्व मान बैठता है तो अवश्य ही उसके नष्ट होने अथवा नष्ट होने की कल्पना से दुःख होता है। किन्तु यह तो अज्ञान है। इसको किसी भी प्रकार से मान्यता नहीं दी जा सकती।
अपने को शरीर समझने वाले अज्ञानी व्यक्ति ही तो मृत्यु अर्थात् देहावसान से भयभीत रहा करते हैं। जो बुद्धिमान अपने को चेतन स्वरूप समझते हैं जो कि वास्तव में उनका स्वरूप है भीवह मृत्यु के भय से कदापि क्लांत नहीं होते। क्योंकि उनकी मृत्यु होती ही नहीं है। चेतन अथवा आत्मा अक्षय तथा अजर-अमर है उसकी मृत्यु होना तो दूर उसे कोई विकार तक नहीं घेरता और यही अमर आत्मा ही तो मनुष्य का वास्तविक अस्तित्व उसका सच्चा स्वरूप है। देहाभिमान ही मृत्यु का मूल कारण है। इसे छोड़कर अपने सत्य स्वरूप आत्मा में विश्वास करिये आपको मृत्यु का भय होने का कोई कारण ही न रह जायेगा। शरीर तो आत्मा की सहायता, उसका अलंकरण तथा प्रकाश करने के लिये बदलते ही रहते हैं हर शरीर पात के बात आत्मा को एक नया तथा सुन्दर शरीर मिलता रहता है-तब यह तो हर्ष तथा प्रसन्नता की ही बात हुई इसमें खेद अथवा दुःख करने का क्या प्रयोजन हो सकता है। भगवान् ने गीता (२/२२) में इस सत्य का उद्घाटन करते हुए स्पष्ट घोषणा कर दी है।
'वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥'
अब इतने पर भी यदि कोई व्यक्ति मृत्यु से भयभीत होता है तो यह उसका दुर्भाग्य ही है कि वह जो कुछ है वह अपने को न मान कर वह मानता है जो वास्तव में है नहीं।
इस सत्य से कौन इनकार कर सकता है कि दिन भर काम करने के बाद शरीर थक जाता है तो रात्रि में विश्राम की आवश्यकता होती है मनुष्य मीठी नींद सोकर दूसरे दिन के लिये नई नई स्फूर्ति तथा शक्ति से भर जाता है। तब जीवन की एक लम्बी अवधि तक चलते रहने पर आत्मा यदि विश्राम करने के लिये मृत्यु रूपी नींद की गोद में चली जाती है तो इसमें खेद की क्या बात है। मृत्यु का एक विश्राम लेकर वह पुनः किसी दूसरे शरीर में जागती है और नवीन स्फूर्ति नये उत्साह से अपने लक्ष्य मोक्ष की ओर अग्रसर हो चलती है।
|
|||||









