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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोगश्रीराम शर्मा आचार्य
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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग
एक नहीं हजार तर्क तथा युक्तियों से यह बात सिद्ध होती है कि मृत्यु यदि उसका वरण ठीक स्थिति में किया जाये तो जीवन से कहीं अधिक सुखकर तथा विश्रामदायिका ही पाई जाती है। महात्मा गांधी के इस कथन में कितना यथार्थ सत्य छिपा हुआ है। इसको देख समझ कर भी क्या मृत्यु से घबराने, उससे घृणा करने अथवा उसे नवरणीय मानने का कोई कारण हो सकता है। वे लिखते हैं-
मुझे तो बहुत बार ऐसा लगता है कि मृत्यु को जीवन की अपेक्षा अधिक सुन्दर होना चाहिए। जन्म से पूर्व माँ के गर्भ में जो यातना भोगनी पड़ती है उसे छोड़ देता हूँ, पर जन्म लेने के बाद तो सारे जीवन भर यातनायें ही भुगतनी पड़ती हैं। इसका तो हमें प्रत्यक्ष अनुभव है। जीवन की पराधीनता हर मनुष्य के लिये एक सी है। जीवन यदि स्वच्छ रहा तो मृत्यु के बाद पराधीनता जैसी कोई बात न होनी चाहिए। बालक जन्म लेता है तो उसमें किसी तरह का ज्ञान नहीं होता। ज्ञान के लिये कितना परिश्रम करना पडता है फिर भी आत्मज्ञान नहीं हो पाता, पर मृत्यु के बाद तो ब्राह्मी स्थिति का बोध सहज ही हो जाता है। यह दूसरी बात है कि विकार युक्त होने के कारण उसका लाभ न उठा सकें। किन्तु जिनका जीवन शुद्ध और पवित्र होता है उन्हें तो उस समय बन्धन मुक्त ही समझना चाहिए। सदाचार का अभ्यास इसीलिए तो जीवन में आवश्यक बताया जाता है ताकि मृत्यु होते ही मनुष्य शाश्वत शांति की स्थिति प्राप्त कर ले।"
वास्तविक बात तो यह है कि जिस मनुष्य ने अपने अपकर्मों द्वारा जीवन को काला बना लिया है। पुण्य प्रकाश से कोई वास्ता नहीं रखा उसका मृत्यु से डरना तो क्या जीवन तक से डर लगा रहता है। सदाचार तथा पुण्य परमार्थ से आलोकित जिन्दगी में तो आनन्द है ही मृत्यु के पश्चात तो अक्षय आनन्द के कोष खुल जाते हैं। मृत्यु का भय छोड़िये और अपने पुण्य पुरुषार्थ द्वारा जीवन एवं मृत्यु दोनों को एक वीर योद्धा की तरह विजय कर अक्षय पद प्राप्त कर लीजिये। मौत से न डरिये, वह तो आपकी मित्र है। मृत्यु के बारे में सामान्य व्यक्तियों की कल्पनायें बड़ी भयावह होती हैं । सारा भय संसार में मौत का ही है। अंधेरे में पाँव रखते जी काँपता है सोचते हैं कहीं सर्प न काट ले। साधारण-सी बीमारी से व्याकुल हो जाते हैं। सोचते हैं कहीं हृदय गति न रुक जाय। दुश्मन से घबड़ाते हैं, कहीं प्राण न हर ले। सर्वत्र मौत का ही भय समाया है, खाते, पीते, चलते, फिरते, उठते, बैठते एक ही आशंका परेशान रखती है, कहीं कुछ हो न जाय जो मौत के मुंह में जाना पड़े।
मौत का विशेषण करने से पहले कुछ आत्म-तत्व पर विचार कर लें। यह देखते हैं कि सम्पूर्ण शरीर किन्हीं दो वस्तुओं के सम्मिश्रण से बना है। शरीर और उसकी चेतना-यह दो अलगअलग वस्तुयें हैं। भ्रम इसलिये होता है कि शरीर की तरह ही चेतन-तत्व दृश्य नहीं है। उसे इन स्थूल आँखों से नहीं देखा जा सकता। फिर भी उसके अस्तित्व से तो इनकार नहीं किया जा सकता। यदि शरीर ही सब कुछ होता तो संभवतः मृत्यु ही नहीं होती या फिर उसका स्वरूप ही कुछ और होता। शरीर की विभिन्न क्रियाओं और चेष्टाओं से भी यह बात सिद्ध हो जाती है कि वह किसी भिन्न तत्व से पराविष्ट है। यह मूलतः आत्मा का सूक्ष्म शरीर ही हो सकता है। भेद सिर्फ इसलिये है कि वह अदृश्य है और हम विश्वास केवल दृश्य पदार्थों पर ही करते हैं।
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