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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोगश्रीराम शर्मा आचार्य
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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग
किसी बैटरी के सेल तोड़कर देखिये आपको कहीं भी विद्युत दिखाई नहीं देगी। रासायनिक तत्व, जिंक, पीतल या तांबे की छड़ आप भले ही देख लीजिये पर बिजली नाम की कोई वस्तु देखने को नहीं मिलेगी। जिन तारों से बिजली दौड़ रही हो उन्हें गौर से देखिये आपको कोई भी वस्तु रेंगती हुई दिखाई न देगी। किन्तु "टंगस्टन" तारों में वही बिजली प्रवाहित होकर प्रकाश के रूप में दिखाई देने लगती है। अत: किसी भी अवस्था में बिजली के अस्तित्व को अस्वीकार नहीं कर सकते।
ठीक यही अवस्था शरीर में आत्म-तत्व की है। वह भी चेतन है वही "मैं" हूँ-इसे जानना चाहिये। जब यह जान लेते हैं कि मनुष्य शरीर नहीं शक्ति है तो हमारे सारे लक्ष्य परिवर्तित हो जाते हैं। दृष्टिकोण ही बदल जाता है। इतनी-सी बात को समझाने के लिए ही मनुष्य के आगे तरह-तरह की घटनायें, ज्ञान और विवेक रखा जाता है।
मृत्यु का भय केवल इसलिये है कि शरीर चला जायेगा। हम समझते हैं कि शरीर चला गया तो सारे सुख चले गये पर यह नहीं सोचते कि सुख चेतना की अनुभूति मात्र है। भोक्ता शरीर नहीं है। शरीर केवल वाहन है। वह एक प्रकार से हमारी सवारी है।
यह बात जान लेने की है कि आत्मा अजर-अमर है तो शरीर के प्रति आसक्ति का भाव नहीं होना चाहिये। शरीर वह साधन मात्र है जिससे हम चाहें तो परमात्मा को प्राप्त कर सकते हैं किन्तु जब मूल लक्ष्य भूल जाता है और शरीर के सुख ही साध्य हो जाते हैं तो मनुष्य को मौत का भय सताने लगता है। यह एक तरह से मनुष्य का अज्ञान ही है अन्यथा मृत्यु मनुष्य के लिए हितकारक ही है। जीर्ण-शीर्ण शरीर की उपयोगिता भी क्या हो सकती है? प्रकृति हमें नया शरीर देने के लिये ही तो अपने पास बुलाती है। "नया शरीर प्राप्त होगा"-इससे तो प्रसन्नता होनी चाहिये। दुःख की इसमें क्या बात है। अच्छी वस्तु प्राप्त करने में तो हर्ष ही होना चाहिये।
महात्मा गांधी ने लिखा है "मुझे तो बहुत बार ऐसा लगता है कि मृत्यु को जीवन की अपेक्षा अधिक सुन्दर होना चाहिए। जन्म से पूर्व माँ के गर्भ में जो यातना भोगनी पड़ती है उसे छोड़ देता हूँ, पर जन्म लेने के बाद तो सारे जीवन भर यातनायें ही भुगतनी पड़ती हैं। इसका तो हमें प्रत्यक्ष अनुभव है। जीवन की पराधीनता हर मनुष्य के लिये एक सी है। जीवन यदि स्वच्छ रहा तो मृत्यु के बाद पराधीनता जैसी कोई बात न होनी चाहिए। बालक जन्म लेता है तो उसमें किसी तरह का ज्ञान नहीं होता। ज्ञान के लिये कितना परिश्रम करना पड़ता है फिर भी आत्मज्ञान नहीं हो पाता, पर मृत्यु के बाद तो ब्राह्मी स्थिति का बोध सहज ही हो जाता है। यह दूसरी बात है कि विकार युक्त होने के कारण उसका लाभ न उठा सकें। किन्तु जिनका जीवन शुद्ध और पवित्र होता है उन्हें तो उस समय बन्धन मुक्त ही समझना चाहिए। सदाचार का अभ्यास इसीलिए तो जीवन में आवश्यक बताया जाता है ताकि मृत्यु होते ही मनुष्य शाश्वत शांति की स्थिति प्राप्त कर ले।"
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