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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग

आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :168
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4164
आईएसबीएन :0000

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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग


दार्शनिक सुकरात का भी ऐसा ही कथन है। उन्होंने लिखा है-"मृत्यु के बारे मे सदैव प्रसन्न रहो, और इसे सत्य मानो कि भले आदमी पर जीवन या मृत्यु के पश्चात् कोई बुराई नहीं आ सकती।" इसलिये मृत्यु से घबड़ाने का कोई कारण हमारी समझ में नहीं आता। मृत्यु से एक शिक्षा हमें मिलती है और वह यह है कि हमसे जितना शीघ्र हो सके परमात्मा को जान लें क्योंकि उसके जाने बिना, जीवन के पाप और बुराइयाँ साथ नहीं छोड़तीं। तरह-तरह की आकांक्षायें पीछे पड़ी रहती हैं। शरीर इस दृष्टि से एक अत्यंत उपयोगी यन्त्र है। जीवन साधना के समस्त उपयोगी उपकरण इसमें मौजूद हैं अतः शरीर की यदि कुछ उपयोगिता हो सकती है तो वह इतनी ही है कि अपने ज्ञान, बद्धि और विवेक के द्वारा, शिक्षा, विचार और वाणी के द्वारा बाह्य और आन्तरिक स्थिति का सही ज्ञान प्राप्त कर लें ताकि फिर दूसरी योनियों में भटकना न पड़े। शरीर के सुख इस दृष्टि से न तो आवश्यक ही हैं और न उपयोगी ही हैं। हमारा उद्देश्य जीवनशोधन और पारमार्थिक लक्ष्य की प्राप्ति ही होना चाहिये।

मृत्यु से डरने की आवश्यकता इसलिये भी नहीं है कि वह एक अनिवार्य स्थिति है। मनुष्य यदि डरे भी तो भी उससे छुटकारा नहीं मिल सकता। जितना जीवन आपको मिला है उससे अधिक कदापि नहीं प्राप्त कर सकते। फिर आप डरें क्यों? बुद्धिमानी तो इसमें है कि आप इस अनिवार्य स्थिति का लाभ उठा लें। आप मृत्यु को बुराइयों से आगाह करते रहने वाला मित्र समझें ताकि इस संसार में रहकर आत्म-कल्याण और परमार्थ के कार्य सुचारु रूप से कर सकें। जितनी जल्दी हो सके आप शुभ कर्मों का अधिक से अधिक संचय कर लें ताकि पटाक्षेप के बाद आप को किसी तरह पछताना न पड़े।

दिन-भर काम करते हुए शरीर थक जाता है तो रात्रि में विश्राम की आवश्यकता पड़ती है। सोना एक प्रकार से थकावट मिटाने की क्रिया है रात पूरी नींद पा लेने से शरीर अगले दिन के लिये पूर्ण स्वस्थ और ताजा हो जाता है। एक नई शक्ति और नवीन प्राण भर जाता है जिससे दूसरे दिन शाम को अथक परिश्रम करते रहते हैं। मृत्यु भी जीवात्मा की ठीक ऐसी ही स्थिति है। जीवन-भर की थकावट मृत्यु की गोद में ही जाकर दूर होती है। अगले जीवन के लिए शक्तिदायिनी स्थिति का नाम ही मृत्यु है। फिर इसे शत्रुवत क्यों देखें। परम विश्राम की अवस्था से हमें प्यार होना चाहिये। फिर इससे हमें लाभ ही तो है। नया जीवन, नई चेतना और नई स्फूर्ति मृत्यु के उपरान्त ही प्राप्त होती है।




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    अनुक्रम

  1. सर्वशक्तिमान् परमेश्वर और उसका सान्निध्य

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