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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोगश्रीराम शर्मा आचार्य
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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग
अलंकारिक रूप से कल्प-वृक्ष उस पेड़ का नाम है, जिसके नीचे बैठकर हर कल्पना, कामना को पूर्ण करने का अवसर मिल जाता है। मोटे अर्थ में जैसा कि कल्प-वृक्ष को समझा जाता है, यदि उस तरह का अस्तित्व कहीं रहा होता तो सारे संसार की तबाही उत्पन्न हो. जाती। सामान्य मनुष्य वासना, तृष्णा, द्वेष, दुर्भाव, लोभ-मोह का पुतला होता है और वे लिप्साएँ ऐसी हैं, जो कभी तृप्त नहीं होती। जितना मिलता जाता है, उतनी ही बढ़ती जाती है। यदि कथित कल्प-वृक्ष कहीं होता और ओछा मनुष्य कुछ घण्टे के लिए भी उसके नीचे बैठ जाता तो सारी विश्व वसुधा को अपनी मुट्ठी में करके सबका सुख, सौभाग्य छीन लेता और स्वयं निरंकुश स्वेच्छाचार बरतता। इसी से इस पृथ्वी पर कल्प-वृक्ष नहीं है और सामान्य मनुष्य उसका लाभ नहीं ले सकते। वह स्वर्ग में बताया गया है, जहाँ देवता रहते हैं। देवताओं की कल्पनायें, भावनायें उत्कृष्ट स्तर की होती है, वे अपने लिए कुछ नहीं-दूसरों के लिए सब कुछ चाहते हैं। इसलिए उनकी कामना पूर्ति सबके लिए श्रेय और संतोष उत्पन्न करने का कारण बनती है। ऐसे ही लोगों के बीच कल्प-वृक्ष की कुछ उपयोगिता भी थी, सो ईश्वर ने ठीक ही उसे यथा स्थान आरोपित किया है।
पृथ्वी का कल्पवृक्ष-अध्यात्म है। उसकी छाया में बैठने पर अनावश्यक-अवांछनीय-अनुपयुक्त, कल्पनायें स्वयमेव तिरोहित हो जाती हैं। जो उचित, उत्तम एवं उपयुक्त है वे ही शेष रह जाती हैं। उनकी पूर्ति के लिए आवश्यक पुरुषार्थ करने की तत्परता अध्यात्मवादी में उत्पन्न होती है, तदनुसार वह अभीष्ट मनोरथ सरलतापूर्वक ग्रहण करता चला जाता है। बाधा केवल अवांछनीय लोभ-मोह की पूर्ति में आती है। सरल-सौम्य और शुभ कल्पनायें संयम, सेवा और सज्जनता से ओत-प्रोत सद्भावनायें हर परिस्थिति में हर मनुष्य तृप्त करता रह सकता है। अध्यात्म निस्संदेह कल्प-वृक्ष है, वह जिस अन्तःकरण में उगेगा, वहाँ न अवांछनीय कल्पनायें उगेंगी और न उनकी पर्ति में बाधा उत्पन्न होने से असन्तोष उत्पन्न होगा। अध्यात्मवादी व्यक्ति सदा सब परिस्थितियों में अपनी आन्तरिक उत्कृष्टता के कारण हँसता, मुस्कराता, तृप्त और सन्तुष्ट देखा जा सकता है। कल्प-वृक्ष का यही तो प्रतिफल होना चाहिए, सो अध्यात्म मार्ग पर चलने वाला कोई भी, कभी भी, यह लाभ परिपूर्ण मात्रा में ले सकता है।
पुरुष को पुरुषोत्तम, आत्मा को परमात्मा, नर को नारायण और लघु को महान् बनाने की विद्या का नाम अध्यात्म है। धन, बुद्धि और बल पाकर लोक में 'बड़े आदमी' बन सकते हैं पर महापुरुष बनाने का श्रेय केवल आत्मबल सम्पन्न को मिलता है। बड़े आदमी अपने शरीर परिवार को सुख सामग्री से सुसज्जित कर सकते हैं और अपने आकर्षण आतंक से सम्पर्क में आने वालों को प्रभावित कर सकते हैं। यह प्रभाव अस्थिर स्वल्प और सीमित है। साथ ही भय, ईर्ष्या-द्वेष और आक्रमण की आशंका से घिरा हुआ भी है। पर महापुरुष का मार्ग निर्बाध है। उनकी आन्तरिक विभूतियाँ इतनी स्थिर और प्रकाशवान होती हैं कि चिरकाल तक दूरवर्ती लोगों तक उनका उत्कर्षप्रद प्रकाश पहुँचता रहता है। अपने को तो असीम शान्ति एवं तृप्ति मिलती ही है।
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