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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोगश्रीराम शर्मा आचार्य
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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग
महापुरुष स्वयं धन्य बनते हैं और चन्दन वृक्ष की तरह अपनी सुगन्ध से समीपवर्ती सारे वातावरण को सुगन्धित कर देते हैं। दीपक की तरह वे स्वयं प्रकाशवान् होते हैं और अपने समीपवर्ती क्षेत्र का अन्धकार दूर कर वहाँ दूसरों की आँखें सार्थक बनाने वाली रोशनी उत्पन्न करते हैं। बड़प्पन की इच्छा ओछे व्यक्ति करते हैं पर जिनका दृष्टिकोण विशाल है, उन्हें महापुरुष बनने की ही आकांक्षा रहती है और अध्यात्मवादी आस्थायें उन्हें उस लक्ष्य तक सफलता एवं सरलतापूर्वक पहुँचा भी देती है। बड़प्पन अगणित उलझनें लेकर आता है, किन्तु महानता से सारी गुत्थियाँ सुलझती हैं। बड़प्पन में विकृतियों की आशंका पग-पग पर विद्यमान हैं पर महानता का पथ निर्द्वन्द्व है। इसी से दूरदर्शी लोग बड़प्पन को तिलाञ्जलि देकर महानता का अवलम्बन लेते हैं और मनुष्य जीवन की सार्थकता का आनन्द लेते हैं। अध्यात्म ही जीवन लक्ष्य की पूर्ति का एक मात्र आधार है, जिसने इसे प्राप्त कर लिया वही बाह्य और अन्तरङ्ग जीवन में सुख-शांति से ओत-प्रोत होने का सौभाग्य प्राप्त करने में सफल हो सका है।
भारत की एकमात्र विशालता एवं सम्पदा उसकी अध्यात्मवादी आस्था ही रही है। इसी से उसे 'पृथ्वी का स्वर्ग' और देवताओं का निवास-स्थल कहलाने का सौभाग्य प्रदान किया और समस्त संसार के सामने हर क्षेत्र में हर दृष्टि से सम्मानित अग्रिणी बना रहा। जहाँ आन्तरिक उत्कृष्टता होगी, वहाँ बाह्य सामर्थ्य एवं समृद्धि की कमी रह ही नहीं सकती। यही विशेषतायें हमें समस्त विश्व का मार्ग-दर्शन करने एवं विविध अनुदान दे सकने योग्य बनाये रह सकीं। अपनी इस विशेषता को खोया तो मणिहीन सर्प की तरह खोखले हो गये।
संसार वालों ने अध्यात्म का प्रथम पाठ पढ़ा है और वे सांसारिक उन्नति की दिशा में बहुत आगे बढ़ गये। साहस, पुरुषार्थ, श्रम, तन्मयता, मधुरता, स्वावलम्बन, नियमितता, व्यवस्था, स्वच्छता, सहयोग जैसे गुण अध्यात्म के प्रथम चरण में आते हैं। इन्हें इस नियम की परिभाषा में अथवा दस लक्षणों में गिना जा सकता है। पाश्चात्य देशों ने उतना भर सीखा है। इन्हीं गुणों से उन्हें शारीरिक, बौद्धिक, आर्थिक, संगठनात्मक एवं वैज्ञानिक उपलब्धियों से भरपूर कर दिया। जो देश कुछ समय पहले तक गई-गजरी स्थिति में पडे थे, उन्होंने अध्यात्म का प्रथम चरण सद्गुणों के रूप में अपनाया और आश्चर्यजनक भौतिक उन्नति कर सकने में सफल हो गये। यदि वे दूसरे चरण उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता की भूमिका में प्रवेश कर सके होते, अध्यात्मवाद का अगला चरण भी बढ़ा सके होते तो उनकी भी वही महानता विकसित हई होती, जो कभी इस भारत भूमि के निवासी महामानवों में निरन्तर प्रस्फुटित होती थी।
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