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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोगश्रीराम शर्मा आचार्य
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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग
हम हर दृष्टि से पिछड़ गये। क्यों हम अध्यात्म के पथ पर एक चरण भी आगे न बढ़ा सके। यों इस देश में धर्म और अध्यात्म का आडम्बर आकाश को छूने जैसा बढ़ता चला जाता है पर यह रामलीला में खड़े किये जाने वाले विशाल- काय कागज और बांस की खपच्चियों से बनाये गये रावण की तरह है। जो देखने भर के लिये बड़ा है, भीतर उसके खोखलापन भरा हुआ है।
प्राचीनकाल में थोड़े से ऋषि थे, उनके प्रभाव से सारा देश ही नहीं सारा विश्व प्रभावित हुआ था। सभी लोग बच्चों का शिक्षण और विकास उन्हीं की छाया में कराते थे, ताकि वे प्रखर व्यक्तित्व से सुसम्पन्न बन सकें। उनका परामर्श और निर्देश राजा-प्रजा सभी को मान्य होता था। उनका पुरुषार्थ और कर्तृत्व समाज के हर वर्ग और हर पहलू को प्रभावित करता था। आशा भी यही की जा सकती है। जब आरोग्यवान्, विद्वान और धनवान् लोग असंख्यों को प्रभावित करते हैं तो कोई कारण नहीं इन सब सम्पन्नताओं से लाखों करोड़ों गुनी शक्तिशाली क्षमता को पाकर स्वयं प्रकाशवान न हों और असंख्यों को प्रकाशित न करें? प्राचीनकाल के गृहस्थ और विरक्त अध्यात्मवादियों के ऊँचे स्तर इस वास्तविकता के प्रमाण भी हैं।
आज की परिस्थिति सर्वत्र विचित्र है, धर्म का कलेवर ओढ़े ५६ लाख सन्त-महात्मा इस देश में मौजूद हैं। पंडित पुरोहितों, धर्मोपदेशकों, कथावाचकों, कीर्तनकारों की संख्या भी लगभग इतनी है। इस प्रकार ५० करोड़ की जनसंख्या वाले इस देश में हर पचास व्यक्ति के पीछे एक व्यक्ति धर्म और अध्यात्म के नाम पर अपना समय पूर्ण करता और निर्वाह चलाता है। यह विशाल जन-समूह यदि वस्तुत: अध्यात्म के तत्त्व-ज्ञान से परिचित रहा झेता तो आज अपना देश न जाने कहाँ की अपेक्षा कहाँ पहुँचा होता। भारत में ७ लाख गाँव हैं। ५६ लाख सन्त। हर गाँव के पीछे ८ सन्त आते हैं और इतने ही पण्डे-पुरोहित। अर्थात् हर गाँव पीछे सोलह व्यक्ति पलते हैं। यदि इन विशाल धर्म ध्वजी जनसमूह के रचनात्मक कार्यक्रम अपना कर लोकमङ्गल के लिये काम किया होता तो देश की सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक शारीरिक, आत्मिक, पारिवारिक, नैतिक स्थिति न जाने कितनी समुन्नत हुई होती और न जाने उसका समस्त संसार पर कितना आशाजनक प्रभाव पड़ा होता।
धर्म स्थलों, धर्म संस्थाओं एवं कर्मकांडों में भारत की गरीब जनता प्रायः ३०० अरब रुपया हर वर्ष व्यय करती है। इतने धन से संसार की ३ अरब जनता को सदज्ञान देने और सत्प्रवृत्तियाँ उभारने के लिये हर व्यक्ति के पीछे १०० रुपया व्यय किया जा सकता था, हमारे देश के धर्मध्वजी एक करोड़ लोग ३०० व्यक्तियों को प्रकाश देने में अपना समय लगा रहे होते तो संसार के हर व्यक्ति को हम अपने महान तत्त्वज्ञान से परिचित और प्रभावित करने में सफल हो गये होते और तब संसार की स्थिति आज की अपेक्षा सर्वथा भिन्न ही हुई होती। पर हो सब कुछ प्रतिकूल रहा है। धर्मध्वजी लोग दूसरों को प्रकाश देने की अपेक्षा स्वयं ही दयनीय स्थिति में पड़े हैं और परावलम्बी दीन-हीन जीवन जी रहे हैं। स्थिति को बारीकी से देखने वाला यही सोचता है कि प्रस्तुत अध्यात्मवाद निरुपयोगी एवं निरर्थक है।
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