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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोगश्रीराम शर्मा आचार्य
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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग
नई पीढ़ी में आस्तिकता एवं धार्मिकता के प्रति कोई आकर्षण नहीं रह गया है, इस स्थिति का उत्तरदायित्व इन महान् अवस्थाओं के उस विकृत स्वरूप का है, जिसने परीक्षा की कसौटी पर अपनी निरर्थकता सिद्ध कर दी है। अब प्रगतिशीलता का अर्थ धर्म और अध्यात्म के प्रति अनास्थावान् होना भी बनता चला जाता है।
अध्यात्म का तत्व-ज्ञान मनुष्य को आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता की विचारणा से ओत-प्रोत भावनाओं से विभोर एवं प्रक्रिया से तत्पर बनाये रखने वाला दार्शनिक अवलम्बन है। हम ईश्वर के सत्चित आनन्द स्वरूप अविनाशी अङ्ग हैं, अस्तु अपनी महानता को अक्षुण्य बनाये रखें। मानव-जीवन महान् प्रयोजन के लिए चिरकाल उपरान्त मिला है, उसका उपयोग उच्च प्रयोजनों के लिये करें। ईश्वर सर्वव्यापी, निष्पक्ष एवं न्यायकारी है,उसके दण्ड एवं कोप से बचने के लिये दुर्भावनाएँ एवं दुष्प्रवृत्तियाँ त्यागें। समस्त प्राणी ईश्वर के पुत्र और अपने भाई हैं, इसलिए उनके साथ सद्व्यवहार करें। अपने पाशविक कुसंस्कारों को हटाने के लिये संघर्ष, साधना, तितीक्षा, संयम एवं तपश्चर्या का अभ्यास करें। फैली हुई दुष्प्रवृत्तियों को हटाने का पुरुषार्थ कर अपने आत्मबल को विकसित करें। आदर्श जीवन जीकर दूसरों के लिये प्रकाश प्रदान करने वाले उज्ज्वल नक्षत्र सिद्ध हों। उन विचारों से ओत-प्रोत रहें, जिनसे शांति मिले। उन कार्यों को अपनायें जिनसे यशस्वी जीवन जीने का अवसर मिले और परलोक में सद्गति को प्राप्त हों। ईश्वर की सृष्टि को सुन्दर, सुगन्धित एवं सुसज्जित बनाने की सेवा साधना में संलग्न रहकर प्रभु का अनुग्रह प्राप्त करें। हृदय कमल पर भाव भगवान की उच्चस्तरीय स्थापना करें। अपनी मनोभूमि ऐसी बनायें जिससे सद्भावना सम्पन्न सद्भक्त कहला सकें। अपने को शरीर नहीं आत्मा समझें और शरीरगत वासना-तृष्णा से ऊँचे उठकर आत्म-कल्याण की गतिविधियाँ अपनायें। काम-क्रोध मोह-मद मत्सर रूपी षट रिपुओं से सावधान रहें। भीतर और बाहर स्वर्गीय वातावरण का सृजन करने के लिए सद्भावनाओं की रीति-नीति अपनायें। तृष्णा और वासना के बन्धनों से मुक्त होकर संकीर्णता से मुक्ति पायें। आदि आस्थाएँ आध्यात्मिकता की पृष्ठ-भूमि हैं। इन्हीं को हृदयङ्गम कराने के लिये सारा धर्म कलेवर खड़ा किया है। समस्त कर्मकांडों के पीछे इन्हीं आस्थाओं को हृदयङ्गम कराने का मनोवैज्ञानिक उद्देश्य छिपा पड़ा है।
पर आज के प्रचलित तथाकथित अध्यात्म की दिशा बिलकुल उल्टी है। वह व्यक्ति को भावनात्मक उत्कर्ष की ओर उठाने की अपेक्षा पतनोन्मुख बनाने में सहायक हो रहा है। भगवान् की कृपा प्राप्त करने के लिये तीर्थ स्नान, देव-दर्शन, भजन कीर्तन आदि के कर्मकाण्ड ही पर्याप्त मान लिये गये हैं, लोगों ने यह सोचना छोड़ दिया है कि इन कर्मकांडों का उद्देश्य भगवान की न्यायकारी सर्वव्यापक सत्ता का हर घड़ी स्मरण दिलाते रहना मात्र है। इस स्मरण का प्रयोजन यह है कि व्यक्ति सब में ईश्वर की झाँकी करके हर किसी से सद्व्यवहार में निरत रहें। न्यायकारी के न्याय से डरें और कुछ करके फलभोग से बच जाने की बात न सोचें। यदि देवदर्शन, भजन कीर्तन आदि के द्वारा उपर्युक्त सदाचरण एवं परमार्थ की भावना उदय हो तो ही इन कर्मकांडों का महत्त्व है। अन्यथा प्रशंसा करके या प्रसाद खिलाकर परमेश्वर के वरदान, आशीर्वाद की ललक एक भ्रम भरी विडम्बना ही कही जायेगी।
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