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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोगश्रीराम शर्मा आचार्य
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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग
भाग्यवाद एवं ईश्वर की इच्छा से सब कुछ होता है जैसी मान्यतायें विपत्ति में असन्तुलित न होने एवं सम्पत्ति में अहंकारी न होने के लिये एक मानसिक उपचार मात्र हैं। हर समय इन मान्यताओं का उपयोग अध्यात्म की आड़ में करने से तो व्यक्ति कायर, अकर्मण्य और निरुत्साही हो जाता है। सोचता है, अपने करने से क्या होगा, जो भाग्य में होगा, ईश्वर की इच्छा होगी वही होगा। पुरुषार्थ की दौड़धूप करने से क्या लाभ? इस प्रकार की मान्यता वाले की प्रगति का क्रम समाप्त हो गया ही समझना चाहिए। आक्रमणकारियों, शोषकों और अत्याचारियों ने उपर्युक्त मान्यता अपने समय के भ्रष्ट धर्मध्वजियों द्वारा रिश्वतें देकर इसलिए चलाई कि शोषित वर्ग उनके अन्याय से लड़ने खड़ा न हो जाय और उन अन्यायों को ईश्वर की इच्छा तथा भाग्य का खेल मानकर चुप बैठा रहे।
संसार को स्वप्न, माया, बंधन, भवसागर कहकर पारिवारिक तथा सामाजिक कर्तव्यों की उपेक्षा करने एवं भिक्षाजीवी निरर्थक जीवन बिताने की पलायनवादी मान्यता अध्यात्म के साथ जब से जुड़ी तब से साधु-ब्राह्मणों और वानप्रस्थों का अति महत्वपूर्ण लोकसेवी वर्ग मिथ्या आडम्बरों में फंसकर तरह-तरह की भ्रांतियाँ फैलाने लगा, समाज के लिये भारभूत बन गया। उपर्युक्त मान्यताएँ केवल वासना तृष्णा को निरर्थक बताने के लिये थीं पर उनकी व्याख्या उलटी की गई और व्यक्ति समाज से विमुख होकर संकीर्ण स्वार्थपरता के दायरे में स्वर्ग मुक्ति और सिद्धियाँ प्राप्त करने की बात सोचने लगा फलतः अध्यात्मवाद की उपयोगिता अनुपयोगिता में बदल गई।
देव शक्तियों से लोग अपने में देवत्व के अवतरण की माँग करते, उनकी विशेषताओं, प्रेरणाओं एवं महानताओं को अपने में जाग्रत करते की आशा रखते तो देव-पूजन का प्रयोजन सिद्ध होता। पर अब तो लोग देवपूजन इस शर्त पर करते हैं कि हमारी अमुक मनोकामना बिना पुरुषार्थ किये अथवा योग्यता उत्पन्न किये ही देव कृपा से अनायास ही पूरी हो जाय। आमतौर से लोग धन, स्वास्थ्य, विवाह, पुत्र, परीक्षा में उत्तीर्ण, नौकरी, शत्रु नाश, विपत्ति निवारण जैसी मनौतियाँ देवता से माँगते हैं और इसके लिये रिश्वत के रूप में कुछ पूजा-पत्री अर्पित करते हैं। इस विकृति का परिणाम यह हुआ कि लोग अपनी योग्यता बढ़ाने एवं पुरुषार्थ करने में जो प्रयत्न करते उन्हें छोड़कर पराक्लम्बी होते चले गये और उन्हें दीन-दरिद्र रहना पड़ा। उलटी और विकृत मान्यतायें किसी को कुछ लाभ नहीं दे सकतीं, केवल दुर्बलता और हानि ही प्रस्तुत कर सकती हैं।
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