आचार्य श्रीराम शर्मा >> आन्तरिक कायाकल्प का सरल किन्तु सुनिश्चित विधान आन्तरिक कायाकल्प का सरल किन्तु सुनिश्चित विधानश्रीराम शर्मा आचार्य
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आन्तरिक कायाकल्प का सरल विधान....
प्रायश्चित का पूर्वार्द्ध- पश्चात्ताप
चान्द्रायण साधना का पूर्वार्द्ध है-पश्चात्ताप और उत्तरार्ध है क्षति पूर्ति। दोनों को मिला देने पर ही प्रायश्चित की वह समग्र प्रक्रिया पूर्ण होती है जिसके आधार पर इस जन्म के एवं पूर्व जन्मों के संचित क्रियमाण दुष्कृत्यों का निराकरण होता है। उपवास भी उस चतुर्विध तपश्चर्या का एक महत्वपूर्ण अंग है, पर इतने भर से ही समग्र उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती। जीवन निर्वाह में भोजन महत्वपूर्ण तो है, पर उसके अतिरिक्त भी जल, साँस तथा विश्राम की आवश्यकता पड़ती है। उपवास को भोजन माना जाय तो चान्द्रायण के साथ जुड़े हुए अन्य अंग-अनुशासनों को भी कम महत्व नहीं दिया जाना चाहिए।
मनुष्य के किए हुए दुष्कर्म ही सांसारिक सुख और आत्मिक प्रगति में प्रमुख बाधा बनकर खड़े रहते हैंं। पैर में काँटा लग जाने पर सारे शरीर को कष्ट होता है और नींद नहीं आती। जब तक उसे निकाल बाहर न किया जाय तब तक चैन नहीं पड़ता। विषैला पदार्थ खा लेने पर पेट में जलन होती है, भारी कष्ट होता है और मृत्यु संकट सामने आ खड़ा होता है। वमन-विरेचन द्वारा उसे विभिन्न नाच नाचने, क्रीड़ा कौतुक करने के लिए विवश करती रहती है। इतना ही नहीं वह परिस्थितियाँ भी इतनी जटिल उत्पन्न कर देती है जो टाले नहीं टलती। कारण कि इनकी जड़ें अचेतन की गहन परतों में होती हैं। जड़ न कटे तो टहनी तोड़ने से ही वृक्ष के अस्तित्व पर क्या असर पड़ने वाला है।
इन दिनों शारीरिक रोगों की अभिवृद्धि दिन दुनी, रात चौगनी होती जा रही है। चिकित्सकों, चिकित्सालयों एवं नित नई औषधियों में आँधी तूफान की तरह बढ़ोत्तरी हो रही है, इतने पर भी उसके नियंत्रण के कोई लक्षण दृष्टिगोचर नहीं होते। इस असमंजस का समाधान एक ही है कि मनःक्षेत्र में घुसती-पनपती उन कुत्साओं-कुण्ठाओं का पर्यवेक्षण निराकरण किया जाय जो न केवल शारीरिक रोगों-मानसिक उद्वेगों के लिए जिम्मेदार हैं, वरन व्यावहारिक जीवन में भी अनेकानेक विग्रह संकट आये दिन खड़े करती है। मनःस्थिति परिस्थिति के लिए उत्तरदायी है
इस तथ्य को समझ लेने पर इस निष्कर्ष पर पहुँचना सम्भव हो सकेगा कि संकटों का आत्यन्तिक समाधान क्या हो सकता है?
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