|
पौराणिक >> अभिज्ञान अभिज्ञाननरेन्द्र कोहली
|
10 पाठक हैं |
||||||
कृष्ण-सुदामा की मनोहारी कथा...
यह व्यक्ति एकदम बौड़म है...वे सोच रहे थे...पर मनुष्य की वृत्तियों का कितना ठीक-ठीक प्रतिनिधित्व करता है। जाते समय जब वे उसके पास पहुंचे थे तो उसमें अधिकार का अहंकार कूट-कूटकर भरा हुआ था। उस समय वह सबसे दुर्व्यवहार कर रहा था। आज उसकी भय और लोभ की पशु-वृत्तियां पुकार-पुकारकर सुदामा को निमन्त्रित कर रही थीं।
आज सुदामा उन व्यापारियों, इस प्रबन्धक या ऐसे ही सब लोगों के लिए महत्त्वपूर्ण हो गये हैं, क्योंकि वे कृष्ण के मित्र के रूप में विख्यात हो गये हैं। और कृष्ण का क्या महत्त्व है? शासन उसके हाथ में है।...यदि आज किसी कारण से सत्ता यादवों के हाथ में न रहे तो?...हां! इसमें असम्भव ही क्या है? मथुरा में यादवों की सत्ता कंस ने छीन ली थी। कृष्ण ने सत्ता लौटा तो ली थी, किन्तु जरासन्ध के भय से मथुरा नगरी ही छोड़ देनी पड़ी।..यहां भी तो पहले कुकुमीन शासक था, फिर पंचजन आया, फिर यादव आये ...ये जो लोग आज सदामा को पूजने लगे हैं, पहले इसी प्रकार ककदमीन के प्रति अपना प्रेम जताते होंगे, फिर यही प्रेम उन्होंने पंचजन राक्षस को अंजुलियां भर-भर कर दिया होगा। आज इनकी पूजा-श्रद्धा, सब कुछ कृष्ण के लिए है; और कृष्ण के माध्यम से सुदामा के लिए है...यह प्रेम, यह पूजा, यह श्रद्धा...किसी गुण के लिए नहीं है, किसी व्यक्ति के लिए नहीं है, यह राज-सत्ता के लिए है। राज-सत्ता के लिए भी नहीं, अपनी पशु-वृत्तियों की तृप्ति के साधनों के लिए है।...कितना अविवेकी है यह मनुष्य...कितनी संकचित दष्टि है इसकी! राजसत्ताएं तो काल के थपेडे से आये दिन उलटती-पलटती हैं, पर मानवता को तो लाखों-करोड़ों वर्षों तक जीना है। प्रेम, पूजा, श्रद्धा, आदर्श, सिद्धान्त, सत्य...ये सब भाव क्या इतने हल्के, सस्ते और मूल्यहीन हैं कि आये दिन सत्ता परिवर्तन के साथ ये भी बेपेंदे के लोटे के समान दिशाहीन डोलते फिरें...सुदामा को आचार्य ज्ञानेश्वर याद हो आये...यही हमारे बुद्धिजीवी करते हैं, यही चिन्तक, दार्शनिक और लेखक करते हैं...वे भूल जाते हैं कि राजसत्ता जिस मोह और त्रास का निर्माण करती है, वह अल्पकालीन होती है; और ऋषि जिन सिद्धान्तों, ग्रन्थों, आदर्शों और नियमों का निर्माण करते हैं, उन्हें मानवता के साथ बहुत दूर तक चलना होता है!
|
|||||
- अभिज्ञान










