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पौराणिक >> अभिज्ञान अभिज्ञाननरेन्द्र कोहली
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कृष्ण-सुदामा की मनोहारी कथा...
यदि मेरे धकेलने से दीवार अपने स्थान से नहीं खिसकती तो उसका यह अर्थ नहीं हुआ कि धकेलने से कुछ खिसकता ही नहीं, इसलिए धकेलना निरर्थक है। मैं चारपाई को धकेलता हूं तो वह खिसकती है, बाल्टी खिसकती है।...धकेलने का फल तो होता है, पर दीवार पर उसका कोई प्रभाव नहीं होता। तो इसका अर्थ यह हुआ कि दीवार को पर्याप्त शक्ति से नहीं धकेला गया। थोड़े काम से बड़े परिणाम की अपेक्षा की गयी। अपनी मनोकामना को प्रकृति के नियमों पर लादने का प्रयत्न किया गया...इस प्रयत्न में तो कामना अधिक हुई, काम कम हुआ।...कर्म को बढ़ाना होगा। दीवार को मार्ग से हटाने के विराट कार्य के लिए विराट् उपकरण इकट्ठे करने होंगे। लोगों को संगठित करना होगा।
कृष्ण ने लोगों के संगठन से बड़े-बड़े अत्याचारी साम्राज्य ढा दिये। आज भी वह निरन्तर प्रयत्नशील हैं। कर्म का फल कर्ता तक पहुंचे, मार्ग की बाधाएं हटाई जायें। ये बाधाएं अनेक हैं-अन्याय के रूप में, अत्याचार और शोषण के रूप में, दूसरे से छीनने और झपटने के रूप में, गलत सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व्यवस्था के रूप में...कृष्ण ने कहा था न्यायपूर्ण सामाजिक और राजनीतिक संगठन से...।
सुदामा अपने नये मन को पहचान रहे थे...कृष्ण अकेला ही क्यों करे यह संघर्ष, सुदामा भी क्यों न करे?...कृष्ण के लिए कर्म का फल होता है तो सुदामा के कर्म का भी फल होगा...अब सुदामा का गुरुकुल बनेगा। इसी गाँव से नहीं, अनेक ग्रामों के बालक, किशोर, तरुण उनके पास अध्ययन के लिए आयेंगे।...सुदामा क्या उनको दर्शन के सैद्धान्तिक प्रासादों में ही भटकाते रहेंगे, वे उन्हें कर्म के राजपथ पर चलना नहीं सिखायेंगे?...अवश्य सिखायेंगे। चिन्तन के साथ कर्म को जोड़ना होगा, सिद्धान्त और व्यवहार को निकट लाना होगा...हताश और थक-हारकर बैठे मनुष्य को यह विश्वास देना होगा कि उसके प्रयत्न से संसार बदलेगा, संघर्ष से लक्ष्य पास आयेगा।...कृष्ण ने यही विश्वास तो दिया है सुदामा को।
सुदामा को लगा, उनकी आँखों के सामने एक नया समाज साकार हो रहा है... भयंकर और विराट अन्यायी शक्तियां ढह रही हैं...कंस मारा गया, जरासंध चीर दिया गया, कालयवन भस्म हो गया, शिशुपाल का सिर कटकर भूमि पर गिर गया...ऐसे ही दुर्योधन भी नहीं रहेगा, कोई भी अन्यायी शक्ति मनुष्य के प्रयत्न के सम्मुख खड़ी नहीं रह पायेगी। प्रयत्न कभी निष्फल नहीं जायेगा, कभी नहीं, कभी नहीं...।
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- अभिज्ञान










