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पौराणिक >> अभिज्ञान अभिज्ञाननरेन्द्र कोहली
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कृष्ण-सुदामा की मनोहारी कथा...
"श्रेष्ठि धनदत्त भी आये थे। वे गुरुकुल के लिए गोशाला बनवा रहे हैं।'' सुशीला ने बताया, "सारे ग्राम के ब्राह्मणों की पत्नियां मेरे पास कई-कई चक्कर लगा गयी हैं कि उनके पतियों की गुरुकुल में नियुक्ति के लिए मैं आपसे कहूं। काशीनाथ की पत्नी भी आयी थी, यदि उसे मैं कोई काम दे सकूँ। पार्वती तो शाम तक मेरे पास ही बैठी थी, यदि गायों की देखभाल के लिए...।"
सुदामा कुछ कह नहीं सके। उन्हें लगा, उनकी कुटिया में कृष्ण का हास्य गूंज रहा है।
सोने के लिए चारपाई पर लेटे तो सुदामा को लगा, उनका मन अत्यन्त शान्त था। सारी हलचलें जाने कहां खो गयी थीं। बस चिन्तन की एक निर्मल धारा नीचे कहीं आत्मा की गहराई में बह रही थी। धारा इतनी निर्मल थी कि उसका तल देखने में उन्हें कोई कठिनाई नहीं हो रही थी। वे अपने मन को साफ-साफ देख पा रहे थे :
कर्म का फल मिलता है-निश्चित रूप से मिलता है। तभी तो कष्ण जीवन-भर संघर्ष करता रहा है। व्यक्ति यदि कर्म करने को स्वतन्त्र न हो और उस कर्म का फल निश्चित न हो तो इस जीवन में फिर रह ही क्या जायेगा। कर्मफल पर यदि कृष्ण को इतना विश्वास न होता तो वह कंस, जरासंध, कालयवन और शिशुपाल जैसे शक्तिशाली नरपतियों के विरुद्ध जन-आन्दोलनों का नेतृत्व कैसे करता? कृष्ण ठीक कहता है कि मनुष्य के कर्म का फल तो उसे मिलता है पर उसे बीच में ही कोई और झपट लेता है. इसलिए उन झपटने वालों को पहचानना होगा, उनके विरुद्ध संघर्ष करना होगा. और उन्हें मार्ग से हटाना होगा...कहां यादव कृषक और पशु-पालन में दीन-हीन बने बैठे थे और कृष्ण ने उन्हें निरन्तर संघर्ष की सार्थकता समझाकर आर्यावर्त के शीर्ष पर बैठाया।
पर क्या प्रत्येक कर्म का फल मिलता है? मैं किसी प्रासाद की पक्की दीवार को धकेलूं तो क्या वह अपने स्थान से हट जायेगी?...नहीं। कदापि नहीं। तो कहां मिला कर्म का फल ?...सुदामा का मन झनझनाने लगा...पर अगले ही क्षण उन्होंने स्वयं को संभाला ...मन को शान्त किया...इस गुत्थी को सुलझाना होगा...।
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