लोगों की राय

पौराणिक >> अभिज्ञान

अभिज्ञान

नरेन्द्र कोहली

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :232
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4429
आईएसबीएन :9788170282358

Like this Hindi book 4 पाठकों को प्रिय

10 पाठक हैं

कृष्ण-सुदामा की मनोहारी कथा...


कपाट तुरन्त खुल गया। हाथ में दीपक लिये सुशीला उनके सामने खड़ी थी। उसके चेहरे पर अद्भुत उल्लास था।

सुदामा का मन शान्त हुआ : सब कुशल-मंगल था। नहीं तो सुशीला इतनी प्रसन्न दिखाई न पड़ती।

सुदामा भीतर आये। ज्ञान और विवेक एक चारपाई पर शान्त पड़े सो रहे थे।

"कैसी हो?"

"ठीक हूं।" सुशीला मुस्कराई, "आप कैसे हैं?"

"थका हुआ हूं।'' सुदामा चारपाई पर बैठ गये, "यहां चारों और बाड़ कैसी लग गयी है?"

सुशीला की प्रसन्नता छिपी नहीं रह सकी। वह खुलकर हंस पड़ी, "इस स्थान पर अब कुलपति सुदामा के गुरुकुल का निर्माण हो रहा है...।"

"ओह!" सुदामा के मुख से निकला, "कौन बनवा रहा है?"

"ग्राम-प्रमुख।"

"क्यों?"

"गुरु सांदीपनि के शिष्य और श्रीकृष्ण के मित्र के सम्मान में।"

"यहां सूचना पहुंच गयी क्या?" सुदामा मुस्करा रहे थे।

"सूचनाएं तो कई माध्यमों से आयी हैं।" सुशीला बोली, "पर डोंडी पीटने को तो. अकेला भृगुदास ही पर्याप्त है। कल से ग्राम-भर में प्रचार करता फिर रहा है, 'श्रीकृष्ण ने सुदामाजी को अपनी बाहों में भर लिया।' श्रीकृष्ण ने यह कहा, वह कहा...।"

सुदामा मुस्कराते रहे।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

    अनुक्रम

  1. अभिज्ञान

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book