|
पौराणिक >> अभिज्ञान अभिज्ञाननरेन्द्र कोहली
|
10 पाठक हैं |
||||||
कृष्ण-सुदामा की मनोहारी कथा...
उनका मन हुआ कि वे उल्टे पैरों द्वारका लौट जायें और इस बार कृष्ण की इच्छानुसार सैनिक गुल्म के साथ, दारुक द्वारा हांके गये रथ पर ही बैठकर, दिन के प्रकाश में अपने गाँव लौटें। जिस व्यक्ति ने उनका घर उजाड़ा है, उसे बांधकर कोड़ों से पिटवाएं; और निर्बलों तथा असहायों की रक्षा न कर पाने के अपराध में ग्राम-प्रमुख को भालों से छिदवायें...।
सहसा सुदामा ने स्वयं को संयत किया : इतने आवेश का समय नहीं आया था। ...तीन दिन की यात्रा कर द्वारका से लौटे हैं। फिर से द्वारका पहंचने के लिए पनः तीन दिन लगेंगे।...सम्भव है कि कृष्ण हस्तिनापुर या इन्द्रप्रस्थ चला गया होगा। इससे तो अच्छा है कि वे स्वयं ही ग्राम-प्रमुख से मिलें। जिसने ग्राम का नाम उनके नाम पर रखने की डोंडी पिटवाई है, वह उनका कुछ तो महत्त्व आँकेगा ही।...सम्भव है कृष्ण के पास जाने की आवश्यकता ही न पड़े।
पर उससे भी पहले उन्हें अपनी कुटिया तक पहुंचने का प्रयत्न तो करना ही चाहिए...वह अपने स्थान पर है भी या नहीं। है तो किस अवस्था में है?
सुदामा उस बाड़ के साथ-साथ आगे बढ़े। बाड़ काफी विस्तृत थी और ऐसा लगता था कि सुदामा का ही नहीं, अनेक अन्य लोगों के कुटीर भी उसमें घेर लिये गये हैं।...'तो क्या यह सारा क्षेत्र ही किसी ने हथिया लिया है?... सुदामा सोचते जा रहे थे।
कुछ और आगे चलकर उन्हें इस बाढ़ में बना एक प्रवेश-द्वार मिल गया। अन्धकार में उसकी बनावट स्पष्ट नहीं थी; किन्तु उसका विस्तार आकर्षक था।
फाटक से प्रविष्ट होकर सुदामा अपनी कुटिया की ओर मुड़े। मार्ग में और कोई विशेष परिवर्तन उन्हें नहीं मिला। बस, कुछ स्थानों पर ऐसी सामग्री अवश्य रखी दिखाई पड़ी, जैसे वहां कुछ और भी निर्माण कार्य चल रहा हो।
सुदामा का कुटीर अपने स्थान पर ठीक अवस्था में खड़ा था। भीतर प्रकाश भी था। भीतर के लोग अभी सोये नहीं थे।...पर भीतर है कौन? सुशीला और बच्चे या...।
सुदामा ने हल्के से पुकारा, "सुशीला!"
|
|||||
- अभिज्ञान










