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पौराणिक >> अभिज्ञान अभिज्ञाननरेन्द्र कोहली
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कृष्ण-सुदामा की मनोहारी कथा...
पर इन सावधानियों की कोई आवश्यकता नहीं पड़ी। कोई उनके निकट नहीं आया। दो-एक बार, थोड़ी दूर से कुछ मनुष्यों और कुछ पशुओं के जाने का आभास हुआ और बस उन्हें भी घर पहुंचने की जल्दी रही होगी। किसी ने ध्यान नहीं दिया कि इन पेड़ों में कोई छिपा बैठा है।
थोडी देर में अन्धकार घना हो गया। सुदामा ने उठकर देखा : कहीं कुछ नहीं दिख रहा था। कहीं कोई गतिविधि नहीं थी। सारा क्षेत्र जैसे सो गया था। अब किसी से भेंट हो जाने की सम्भावना नहीं थी। और कोई एक-आध व्यक्ति मिल भी गया तो उसका सामना करना कोई ऐसा कठिन भी नहीं होगा।
सुदामा को स्वयं अपने आप पर आश्चर्य हुआ : घर के इतने निकट आकर भी वे कैसे रुक गये? क्या सामान्यतः यह उनके लिए सम्भव था? नहीं, तो क्या कृष्ण से मिलकर सुदामा कुछ बदल गये हैं?
अपनी कुटिया से कुछ पहले ही सुदामा चौककर रुक गये। यह क्या? यहां तो किसी ने बाड़ लगाकर मार्ग रोक दिया था।
'यह क्या हुआ?' सुदामा का मस्तिष्क झनझनाने लगा था, 'क्या किसी ने इस भूमि को घेरकर इस पर अपना आधिपत्य जमा लिया है? क्या यह भूमि किसी की व्यक्तिगत सम्पत्ति हो गयी है...यदि यह किसी की सम्पत्ति हो गयी है तो फिर सदामा की कटिया का क्या हुआ? क्या उनकी कुटिया उजाड़कर फेंक दी गयी? पर सुशीला और बच्चे? धिक् मूर्ख सुदामा! तुम आकर कौतुक के मारे ग्राम के बाहर छिपा बैठा रहा और रंचमात्र भी चिन्ता नहीं की कि सुशीला और बच्चों का क्या हुआ होगा? उजाले में आया होता तो कुछ खोज-बीन करता। अब इस अंधेरे में उन्हें कहां खोजा जा सकता है, जब सारा गाँव सो गया है।...
सुदामा के जी में आया कि अपना मुंह नोच लें। बहुत चतुर बन रहे थे और कैसे। निकले मूर्ख!
पर दूसरे ही क्षण उनका आत्मबल जागा : इतने दुखी होने की क्या बात है। वे अब इतने दुर्बल नहीं हैं। उनकी भी सुनवाई होगी। वे लौट कर फिर कृष्ण के पास जायेंगे। जो उनके नाम पर गाँव का नाम बदलने का आदेश दे सकता है, वह उन्हें उनकी कुटिया की भूमि भी लौटा सकता है।...वे नहीं जानते थे कि वह भूमि उनकी है या नहीं! पर वे पीढ़ियों से वहीं रह रहे हैं। उनके द्वारका जाने तक वह भूमि और किसी की नहीं थी, तो उनके जाते ही...।
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