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रवि कहानी
रवि कहानी
प्रकाशक :
नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया |
प्रकाशित वर्ष : 2005 |
पृष्ठ :85
मुखपृष्ठ :
पेपरबैक
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पुस्तक क्रमांक : 474
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आईएसबीएन :81-237-3061-6 |
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4 पाठकों को प्रिय
456 पाठक हैं
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नेशनल बुक ट्रस्ट की सतत् शिक्षा पुस्तकमाला सीरीज़ के अन्तर्गत एक रोचक पुस्तक
''गोरा'' उपन्यास खत्म होने के बाद रवीन्द्रनाथ ने''गीतांजलि'' लिखना शुरू किया। इस समय शांतिनिकेतन में कवि के पच्चास साल पूरे कर लेने की खुशी में जलसा हुआ। उन्हीं दिनों ''राजा'' नाटक भी लिखागया। इस नाटक को नौ साल बाद दुबारा मंच के लायक बनाकर उसका नाम ''अरूप रतन'' रखा गया। इसके बाद ''अचलायतन'' नाटक लिखा गया। ''जीवन स्मृति'' नामसे उन्होंने आत्मकथा भी लिखी। उस समय वे खूब लिख रहे थे। कुछ दिनों के बाद उन्होंने एक नया सांकेतिक नाटक ''डाकघर'' लिखा। उन्हीं दिनों ''जन गण मनअधिनायक'' गीत लिखा गया। जिसे सन् 1911 में कलकत्ता कांग्रेस में गाया गया। अगले साल ''ब्रह्मोत्सव'' में भी यही गीत गाया गया।
इन सब कामों के बीच अपनी जमींदारी में किसानों की बेहतरी के लिए भी वे चिंता कररहे थे। उनके काम और चिट्ठियां इसकी गवाह हैं। उन्होंने शिलाईदह से अपने बेटे रवीन्द्रनाथ को एक चिट्ठी में लिखा - ''बोलपुर में एक चावल की मशीनचल रही है। ऐसी ही एक मशीन वहां भी उपयोगी होगी। यह अंचल तो धान का ही है। बोलपुर से ज्यादा धान की पैदावार यहां होती है। मेरी इच्छा है कि 5-10रूपये चंदा करके यहां के अधिकतर किसान मिलकर अगर इस मशीन को लगा लें तो उनमें आपस में मिलजुल कर काम करने की असली भावना पैदा होगी।'' रवीन्द्रनाथने इस पत्र में किसानों के लिए कुटीर शिल्प को भी जरूरी बताया था। उन्होंने उन्हें पॉटरी और छाता तैयार करने की विधि सिखाने की भी कोशिश की।इसके अलावा पतिसर कृषि बैंक खोलकर किसानों के लिए आसान दरों पर ब्याज पर रूपये लेने का भी उन्होंने इंतजाम किया।
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