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रवि कहानी
रवि कहानी
प्रकाशक :
नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया |
प्रकाशित वर्ष : 2005 |
पृष्ठ :85
मुखपृष्ठ :
पेपरबैक
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पुस्तक क्रमांक : 474
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आईएसबीएन :81-237-3061-6 |
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4 पाठकों को प्रिय
456 पाठक हैं
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नेशनल बुक ट्रस्ट की सतत् शिक्षा पुस्तकमाला सीरीज़ के अन्तर्गत एक रोचक पुस्तक
चार
रवीन्द्रनाथ ने विलायत जाने की पूरी तैयारी कर ली। जहाज में जाने के दौरान वे''गीतांजलि'', ''गीतिमाला'' आदि कविताएं चुनकर उनका अंग्रेजी में अनुवाद करने लगे। वे पोर्ट सैयद पहुंचे। वहां से फ्रांस के भार्सई बंदरगाह। उसकेबाद पेरिस। पेरिस में एक दिन रहकर वे लंदन रवाना हुए। उनके साथ उनके पुत्र रथीन्द्रनाथ और पुत्रवधू प्रतिभा देवी थीं। वे एक होटल में ठहरे।रवीन्द्रनाथ बाईस साल बाद लंदन पहुंचे थे। इस बीच शहर काफी बदल चुका था। उसकी व्यस्तता, गाड़ी-घोड़ों की बढ़ती भीड़ आदि ने रवीन्द्रनाथ को प्रभावितही किया।
रवीन्द्रनाथ जब इंग्लैंड पहुंचे तब उनके पहले के परिचितकाफी बंगाली छात्र वहां पर थे। उनमें सुकुमार राय, कालीमोहन घोष, केदारनाथ चट्टोपाध्याय, अवनीन्द्र मोहन बोस आदि मुख्य थे। इसके अलावा पी. सी. राय,डा. देव प्रसाद सर्वाधिकारी, ब्रजेन्द्रनाथ शील, प्रमथलाल सेन आदि भी वहां थे। रवीन्द्रनाथ होटल छोड़कर हैम्पस्टेड हीथ में एक किराये का मकान लेकरबेटे-बहू समेत वहां रहने लगे। वे पहले से परिचित एक ब्रिटिश कलाकार रोटेनस्टाइन से मिलने गए। वे कुछ समय पहले जोड़ासांको में गगनेन्द्रनाथ तथाअवनीन्द्रनाथ के मेहमान भी रहे थे। रवीन्द्रनाथ अंग्रेजी 'गीतांजलि' की पांडुलिपि पढ़ने के लिए उन्हें दे आए। उन्होंने प्रसिद्ध कवि यीट्स को भीअपनी पांडुलिपि पढ़ने के लिए दी।
थोड़े दिनों में ही इंग्लैंड केकई साहित्यकारों और विद्वानों से उनका परिचय हुआ। 12 जुलाई सन् 1912 को रवीन्द्रनाथ की एक सम्मान सभा में कवि यीट्स सभापति बने। उन्होंने अपनाभाषण खत्म करते हुए कहा, ''रवीन्द्रनाथ के लगभग सौ गीतों के गद्य अनुवादों की एक पांडुलिपि मैं हमेशा साथ लिए रहता हूं। अपने समकालीन किसी और लेखककी ऐसी किसी अंग्रेजी रचना के बारे में मैं नहीं जानता, जिसके साथ इन कविताओं की तुलना की जा सके।''
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