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मनोरंजक कथाएँ >> अलादीन औऱ जादुई चिराग

अलादीन औऱ जादुई चिराग

ए.एच.डब्यू. सावन

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :16
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4779
आईएसबीएन :81-310-0200-4

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अलादीन की रोचक एवं मनोरंजक कहानी का वर्णन


बादशाह के कानों तक भी यह खबर पहुंची। उसने फौरन बग्घी मंगाई और उसमें बैठकर अलादीन के महल की ओर चल दिया। बादशाह के महल पहुँचने पर अलादीन ने तहेदिल से उसका इस्तकबाल किया।
अलादीन और शहजादी को देखकर बादशाह बेहद खुश हुआ। अलादीन ने उसे सारी आपबीती कह सुनाई। सारी बात सुनकर बादशाह हैरान रह गया। अलादीन ने बादशाह को मरे हुए जादूगर की लाश भी दिखाई। बादशाह को अलादीन पर बहुत नाज हो रहा था। उसने फौरन एक आदमी बुलाकर जादूगर की लाश को जंगल में फेंक आने का हुक्म दिया। सिपाही जादूगर की लाश लेकर चले गये। तब बादशाह ने अलादीन से कहा-“मैंने तुम्हारे साथ जो बर्ताव किया उसका मुझे बेहद अफसोस है; इसलिये मैं तुमसे माफी मांगता हूँ।”
माफी मांगकर आप मुझे शर्मिंदा कर रहे हैं। आपकी जगह कोई भी होता, तो अपनी बेटी के अचानक गायब हो जाने पर ऐसा ही करता। मैं तो आपका सेवक हूँ।”
बादशाह ने अलादीन की बात सुनी तो उसे गले से लगा लिया। शहजादी. के सिर पर हाथ फेरा और दोनों को दुआयें देकर वहाँ से चला गया।
अलादीन को अपनी शहजादे की उपाधि वापस मिल गयी। सारी जनता भी अलादीन की वापसी पर बहुत खुश थी। बादशाह ने कई दिनों तक त्यौहार मनाने का ऐलान किया जिसमें सारी जनता ने जोर-शोर से भाग लिया।
अलादीन तथा शहजादी की जिन्दगी में फिर से खुशियां लौट आयीं। उनके जीवन में अब कोई गम बाकी नहीं रह गया था।
कुछ वक्त गुजर जाने पर शहजादी ने एक चाँद-से बेटे को जन्म दिया। अलादीन और शहजादी का बेटा शहजादी जैसा ही खूबसूरत था। उन्होंने बड़े प्यार से उसका नाम ‘अशरफ' रखा। इतना खूबसूरत और तन्दरूस्त बेटा। पाकर अलादीन और शहजादी की जिन्दगी में खुशियां-ही-खुशियां आ गईं। उनकी जिन्दगी खुशगवार गुजरने लगी।
वैसे तो अफ्रीकी जादूगर को मरे बहुत वक्त गुजर गया था लेकिन यह कुदरत का करिश्मा ही था कि उस दुष्ट की लाश आज भी ज्यों-की-त्यों पड़ी हुई थी। किसी जानवर तक ने उसे खाने की कोशिश नहीं की थी।
एक दिन आधी रात के वक्त जादूगर की लाश से कुछ दूरी पर आसमान से बिजली-सी गिरी और एक गड़गड़ाहट के साथ जमीन फट गयी तथा जमीन में एक सुरंग-सी बन गयी। सुरंग में से बहुत भयंकर शक्ल.का एक बूढ़ा आदमी बाहर निकला। बूढे के चेहरे पर इन्सानियत का नामोनिशान न थां। चेहरे पर हैवानियत साफ-साफ टपक रही थी। वह जादूगर की लाश के पास आकर बहुत गौर से उसे देखने लगा, इसके बाद उसने इधर-उधर देखा। दूर-दूर तकं गहरा अंधकार फैल हुआ था। कभी-कभार दूर कहीं किसी जानवर के बोलने की आवाज सुनाई दे जाती थी।
बूढ़ा आदमी आगे बढ़ा और उसने जादूगर की लाश को किसी रबड़ के गुड्डे की तरह उठाया और अपने कंधे पर लादकर एक ओर चल दिया। उसने जादूगर की लाश को बहुत ही आसानी से कंधे पर उठा रखा था, इससे ही, उसकी ताकत का अंदाजा लगाया जा सकता था। जादूगर की लाश को कंधे | पर लेकर वह चुपचाप उसी सुरंग में समा गया जिसमें से वह बाहर आया था।

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