Adbhut Dweep - Hindi book by - Srikant Vyas - अद्भुत द्वीप - श्रीकान्त व्यास
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अद्भुत द्वीप

श्रीकान्त व्यास

प्रकाशक : शिक्षा भारती प्रकाशित वर्ष : 2019
पृष्ठ :80
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5009
आईएसबीएन :9788174830197

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जे.आर.विस के प्रसिद्ध उपन्यास स्विस फेमिली रॉबिन्सन का सरल हिन्दी रूपान्तर...

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फ्रिट्‌ज ने जेनी के बारे में जो हिदायत दी थी उसका बड़ा मजेदार असर हुआ। जैक, अर्नेस्ट और फ्रांसिस के मुंह पर मानो ताला लग गया। लेकिन उनकी वही जिज्ञासा बजाय मुंह के आँखों के रास्ते से प्रकट होती थी। वे बेचारे फ्रिट्‌ज के प्रति आदर के कारण बोल तो कुछ न पाते, लेकिन टकटकी लगाए जेनी के चेहरे को जरूर देखते रहते। अन्त में जेनी ने ही उनकी मदद की, और सबकी झिझक मिटा दी।

जेनी के व्यवहार से बच्चों के चेहरे की खोई हुई प्रसन्नता फिर लौट आई जहां कुछ देर पहले तक वह अजनबीपन महसूस कर रहे थे, वहीं अब वे घुलने-मिलने की कोशिश करने लगे। यह देखकर खुद मैंने ही जेनी को इस बात के लिए प्रेरित किया कि वह अपनी कहानी सुनाए। मेरे आग्रह को जेनी टाल न सकी। अपनी जो कहानी उसने सुनाई वह इस प्रकार थी :
''मेरा जन्म एशिया महाद्वीप के देश भारत में हुआ था। मेरे पिता सर एडवर्ड मीनट्रोस अंग्रेज थे और भारत में सेना के एक ऊंचे पद पर थे। मेरी मां भी अंग्रेज महिला थीं। लेकिन उनकी मृत्यु उनके विवाह के सिर्फ तीन साल बाद मेरे जन्म के समय ही हो गई थी। मां की मृत्यु के कारण पिता का सारा प्यार मेरे ऊपर ही निछावर हो गया। एक क्षण के लिए भी मां की कमी मुझे महसूस नहीं हुई। पिता ने बचपन से ही मुझे लड़के की तरह रखा और पाला-पोसा। लड़कों जैसे कपड़े, लड़कों जैसी आदतें। सोलह वर्ष की उम्र तक आते-आते निशानेबाजी, तैराकी और घुड़सवारी में कुशल हो गई। आज मैं सोचती हूं कि अगर मैंने यह चीजें न सीखी होतीं तो अब तक मैं मर चुकी होती। कुछ दिन बाद इंग्लैंड से मेरे पिता को आदेश मिला कि वे अपनी टुकड़ी के साथ इंग्लैंड वापस आ जाएं। लेकिन यह हिदायत भी थी कि उस जहाज पर वे अपनी लड़की को, यानी मुझे, नहीं ले जा सकते। तब मेरे पिता ने एक दूसरे जहाज पर अपने एक दोस्त के साथ मेरी यात्रा का प्रबन्ध कर दिया। दुर्भाग्य की बात कि जिस जहाज से मैं इंग्लैंड जा रही थी, रास्ते में वह एक तूफान की चपेट में आ गया। जहाज को खतरे में पड़ा देख लोगों ने जीवन-नौकाओं का सहारा लिया। लेकिन दुर्भाग्य ने मेरा साथ तब भी नहीं छोड़ा। मैं जिस जीवन नौका पर थी वह भी टुकड़े-टुकड़े हो गई। उस पर जितने भी लोग थे उनमें से केवल मैं जीवित बच पाई, बाकी सब लोग सदा के लिए समुद्र के अथाह जल में खो गए।

''जब मुझे होश आया तो मैंने अपने आपको इसी तट पर पाया। कई दिनों तक मैं उस पूरे टापू पर भूख और प्यास से तड़पती भटकती रही। अंत में जाने कैसे मेरे अन्दर हिम्मत आ गई और आज तक मैं अपने आपको किसी तरह जिन्दा रख सकी।''

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    अनुक्रम

  1. एक
  2. दो
  3. तीन
  4. चार
  5. पाँच
  6. छह
  7. सात
  8. आठ
  9. नौ
  10. दस

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