लोगों की राय

जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2018
पृष्ठ :188
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6042
आईएसबीएन :9788170287285

Like this Hindi book 4 पाठकों को प्रिय

57 पाठक हैं

प्रस्तुत है महात्मा गाँधी की आत्मकथा ....

अक्षर-ज्ञान


पिछले प्रकरण में शारीरिक सिक्षा और उसके सिलसिले में थोड़ी दस्तकारी सिखाने काकाम टॉल्सटॉय आश्रम में किस प्रकार शुरू किया गया, इस हम कुछ हद तक देख चुके है। यद्यपि यह काम मैं ऐसे ढंग से तो कर ही न सका जिससे मुझे संतोषहो, फिर भी उसमें थोड़ी-बहुत सफलता मिली थी। पर अक्षर-ज्ञान देना कठिन मालूम हुआ। मेरे पास उसके लिए आवश्यक सामग्री न थी। स्वयं मुझे जितना मैंचाहता था उतना समय न था, न मुझमे उतनी योग्यता थी। दिनभर शारीरिक काम करते-करते मैं थक जाता था और जिस समय थोड़ा आराम करने की जरूरत होती उसीसमय पढ़ाई के वर्ग लेने होते थे। अतएव मैं ताजा रहने के बदले जबरदस्ती स जाग्रत रह पाता था। इसलिए दुपहर को भोजन के बाद तुरन्त ही शाला का कामशुरू होता था। इसके सिवा दूसरा कोई भी समय अनुकूल न था।

अक्षर-ज्ञान के लिए अधिक से अधिक तीन घंटे रखे गये थे। कक्षा में हिन्दी, तामिल,गुजराती और उर्दू भाषाये सिखायी जाती थी। प्रत्येक बालक को उसकी मातृभाषा के द्वारा ही शिक्षा देने का आग्रह था। अंग्रेजी भी सबको सिखायी जाती थी।इसके अतिरिक्त गुजरात के हिन्दू बालकों को थोड़ा संस्कृत का और सब बालकोंकोथोड़ा हिन्दी का परिचय कराया जाता था। इतिहास, भूगोल और अंकगणित सभी को सिखाना था। यही पाठयक्रम था। तामिल और उर्दू सिखाने का काम मेरे जिम्मेथा।

तामिल का ज्ञान मैंने स्टीमरों में और जेल में प्राप्त कियाथा। इसमे भी पोप-कृत उत्तम 'तामिल स्वयं शिक्षक' से आगे मैं बढ़ नहीं सका था। उर्दू लिपि का ज्ञान भी उतना ही था जितना स्टीमर में हो पाया था। और,फारसी-अरबी के खास शब्दों का ज्ञान भी उतना ही था, जितना मुसलमान मित्रोंके परिचय से प्राप्त कर सका था ! संस्कृत जितनी हाईस्कूल में सीखा था उतनीही जानता था। गुजराती का ज्ञान भी उतना ही था जितना शाला में मिला था।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book