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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग सत्य के प्रयोगमहात्मा गाँधी
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प्रस्तुत है महात्मा गाँधी की आत्मकथा ....
येसम्बन्ध अभी ताजे हैं। श्रद्धानन्दजी, देशबन्धु, लालाजी और हकीम साहब आजहमारे बीच नहीं हैं। पर सौभाग्य से दूसरे कई नेता अभी मौजूद हैं। कांग्रेसके महान परिवर्तन के बाद का इतिहास अभी तैयार हो रहा है। मेरे मुख्य प्रयोग कांग्रेस के माध्यम से हुए हैं। अतएव उन प्रयोगों के वर्णन मेंनेताओं के सम्बन्धों की चर्चा अनिवार्य है। शिष्टता के विचार से भी फिलहालतो मैं ऐसा कर ही नहीं सकता। अंतिम बात यह है कि इस समय चल रहे प्रयोगोंके बारे में मेरे निर्णय निश्चयात्मक नहीं माने जा सकते। अतएव इन प्रकरणोंको तत्काल तो बन्द कर देना ही मुझे अपना कर्तव्य मालूम होता है। यह कहनागलत नहीं होगा कि इसके आगे मेरी कलम ही चलने से इनकार करती है।
पाठको से बिदा लेते हुए मुझे दुःख होता है। मेरे निकट अपने इन प्रयोगों की बड़ीकीमत है। मैं नहीं जानता कि मैं उनका यथार्थ वर्णन कर सका हूँ या नहीं। यथार्थ वर्णन करने में मैंने कोई कसर नहीं रखी है। सत्य को मैंने जिस रूपमें देखा है, जिस मार्ग से देखा है, उसे उसी तरह प्रकट करने का मैंने सततप्रयत्न किया है और पाठको के लिए उसका वर्णन करके चित्त में शान्ति काअनुभव किया है। क्योंकि मैंने आशा यह रखी है कि इससे पाठको में सत्य औरअहिंसा के प्रति अधिक आस्था उत्पन्न होगी।
सत्य से भिन्न कोई परमेश्वर है, ऐसा मैंने कभी अनुभव नहीं किया। यदि इन प्रकरणों केपन्ने-पन्ने से यह प्रतीति न हुई हो कि सत्यमय बनने का एकमात्र मार्ग अहिंसा ही है तो मैं इस प्रयत्न को व्यर्थ समझता हूँ। मेरी अहिंसा सच्चीहोने पर भी कच्ची है, अपूर्ण है। अतएव हजारों सूर्यो को इकट्ठा करने से भीजिस सत्यरूपी सूर्य के तेज का पूरा माप नहीं निकल सकता, सत्य की मेरीझाँकी ऐसे सूर्य की केवल एक किरण के दर्शन के समान ही है। आज तक के अपनेप्रयोगों के अन्त में मैं इतना तो अवश्य कह सकता हूँ कि सत्य का संपूर्णदर्शन संपूर्ण अहिंसा के बिना असम्भव है।
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