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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग सत्य के प्रयोगमहात्मा गाँधी
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प्रस्तुत है महात्मा गाँधी की आत्मकथा ....
ऐसे व्यापकसत्य-नारायण के प्रत्यक्ष दर्शन के लिए जीवनमात्र के प्रति आत्मवत् प्रेम की परम आवश्यकता है। और, जो मनुष्य ऐसा करना चाहता है, वह जीवन के किसी भीक्षेत्र से बाहर नहीं रह सकता। यही कारण है कि सत्य की मेरी पूजा मुझे राजनीति में खींच लायी है। जो मनुष्य यह कहता है कि धर्म का राजनीति केसाथ कोई सम्बन्ध नहीं है वह धर्म को नहीं जानता, ऐसा कहने में मुझे संकोच नहीं होता और न ऐसा कहने में मैं अविनय करता हूँ।
बिना आत्मशुद्धि के जीवन मात्र के साथ ऐक्य सध ही नहीं सकता। आत्मशुद्धि केबिना अहिंसा-धर्म का पालन सर्वधा असंभव है। अशुद्ध आत्मा परमात्मा के दर्शन करने में असमर्थ है। अतएव जीवन-मार्ग के सभी क्षेत्रो में शुद्धि कीआवश्यकता है। यह शुद्धि साध्य है, क्योंकि व्यष्टि और समष्टि के बीच ऐसा निकट सम्बन्ध है कि एक की शुद्धि अनेको की शुद्धि के बराबर हो जाती है। औरव्यक्तिगत प्रयत्न करने की शक्ति तो सत्य-नारायण ने सबको जन्म से ही दी है।
लेकिन मैं प्रतिक्षण यह अनुभव करता हूँ कि शुद्धि का मार्ग विकट है। शुद्ध बनने का अर्थ है मन से, वचन से और काया से निर्विकार बनना,राग-द्वेषादि से रहित होना। इस निर्विकारता तक पहुँचने का प्रतिक्षण प्रयत्न करते हुए भी मैं पहुँच नहीं पाया हूँ, इसलिए लोगों की स्तुति मुझेभुलावे में नहीं डाल सकती। उलटे, यह स्तुति प्रायः तीव्र वेदना पहुँचातीहै। मन के विकारों को जीतना, संसार को शस्त्र से जीतने की अपेक्षा मुझेअधिक कठिन मालूम होता है। हिन्दुस्तान आने के बाद भी अपने भीतर छिपे हुएविकारों को देख सका हूँ, शर्मिन्दा हुआ हूँ किन्तु हारा नहीं हूँ। सत्य केप्रयोग करते हुए मैंने आनन्द लूटा है, और आज भी लूट रहा हूँ। लेकिन मैंजानता हूँ कि अभी मुझे विकट मार्ग तय करना है। इसके लिए मुझे शून्यबत्बनना है। मनुष्य जब तक स्वेच्छा से अपने को सबसे नीचे नहीं रखता, तब तकउसे मुक्ति नहीं मिलती। अहिंसा नम्रता की पराकाष्ठा है और यह अनुभव-सिद्धबात है कि इस नम्रता के बिना मुक्ति कभी नहीं मिलती। ऐसी नम्रता के लिए प्रार्थना करते हुए और उसके लिए संसार की सहायता की याचना करते हुए इस समयतो मैं इन प्रकरणों को बन्द करता हूँ।
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