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जीवनी/आत्मकथा >> युगद्रष्टा भगत सिंह

युगद्रष्टा भगत सिंह

वीरेन्द्र सिन्धु

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :320
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 615
आईएसबीएन :9789350642375

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प्रस्तुत है भगत सिंह की जीवन का ऐतिहासिक दस्तावेज...

Yugdrista Bhagat Singh - A hindi Book by - virendra sindhu युगद्रष्टा भगत सिंह - वीरेन्द्र सिन्धु

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

अमर शहीद प्रसिद्ध क्रांतिकारी सरदार भगतसिंह की यह प्रामाणिक जीवनी वर्षों के अध्ययन और रिसर्च का परिणाम है। लेखिका है सरदार भगतसिंह के छोटे भाई कुलतार सिंह जी की सुपुत्री वीरेन्द्र सिन्धु। परिवार के सभी वरिष्ठ सदस्यों की जुबानी उन्हें जो महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ मिली, वे पहली बार इस पुस्तक में समाविष्ट हैं। प्रस्तुत संस्करण अनेक वर्षों बाद आकर्षक ढंग से प्रकाशित किया गया है। इसमें सरदार भगतसिंह और उनके पुरखे के जीवन-वृत्त तो हैं ही साथ ही युवा क्रांतिकारियों द्वारा अंग्रेजों से देश की आजादी के संघर्ष का रोमांचक वर्णन भी है। यह पुस्तक एक प्रामाणिक ऐतिहासिक दस्तावेज़ है।

 

अध्ययन के द्वार पर

 

 

‘‘पिस्तौल और बम कभी इन्कलाब नहीं लाते,
बल्कि इन्कलाब की तलवार
विचारों की सान पर तेज़ होती है !’’

 

-भगतसिंह

 

सरदार अर्जुनसिंह ने साहस कर अन्धविश्वास और परम्परावाद की जड़ता से बन्द अपने घर के द्वार खोल दिए और ऊबड़-खाबड़ मार्ग को साफ कर अपने आंगन में यज्ञवेदी बना दी।
सरदार किशनसिंह ने उस द्वार के आंगन तक के क्षेत्र को लीप-पोत कर उस यज्ञवेदी पर एक विशाल हवन-कुण्ड प्रतिष्ठित कर दिया।
सरदार अजीतसिंह ने उस हवन-कुण्ड में समधाएं सजा कर एक दहकता अंगारा रख दिया।
सरदार स्वर्णसिंह ने उसे झपटकर लपट में बदल दिया।
बस फिर क्या था, लपटें उठीं और खूब उठीं।

सरदार अजीतसिंह उन लपटों के लिए ईंधन की तलाश में दूर चले गए और जल्दी लौट न सके।
वे लपटें बुझ जातीं, पर सरदार किशनसिंह उनके अंगरक्षक बने रहे, उन्हें बचाए रहे।
भगतसिंह ने इधर-उधर ईंधन की तलाश न कर अपने जीवन को ही ईंधन बना झोंका और लपटों को पूरी तरह उभारकर इस तरह उछाल दिया कि वे देश-भर में फैल गईं, देश का हर आंगन एक हवन-कुणड बन गया।
भारत माता के इन पांच पुत्रों की जीवन और कर्म ही इस ग्रन्थ का विषय है।

सरदार अर्जुनसिंह के बड़े-पुरखे महाराजा रणजीतसिंह की सेना में थे। राजा रणजीतिसिंह अंगरेजों की कपट रणनीति के अन्तिम शिकार थे। उनके बाद अंग्रेजों ने जो व्यवहार किया, वह अंगरेज राजनीति का एक बहुत ही गन्दा पृष्ठ है। इस सबने उन पुरखों में जो विद्रोही घृणा जगा दी थी, वह पारिवारिक धरोहर के रूप में सरदार अर्जुनसिंह को मिली। यह धरोहर ही थी जो परिवर्तन की प्यास बनकर उन्हें सामाजिक क्रान्ति के यज्ञ-मण्डप में ले आई।
हम कमजोर हैं, अलग-अलग हैं, निहत्थे हैं। इसके विरुद्ध वे शक्तिशाली हैं; संगठित हैं। हम उनका कुछ नहीं कर सकते, कुछ बिगाड़ नहीं सकते। 1857 में प्रयत्न करके तो हमने देख लिया ! क्या हुआ सिवाय इसके कि हम और पिटे और पिसे और अपमानित हुए !!

वे अब शासक हैं, हम अब शासित हैं। उन्हें अब शासक रहना है, हमें अब शासित रहना है। गुलामी और गुलामी, बस यही हमारा भाग्य है, यही हमारा भविष्य है।
देश की परिस्थितियों और अंग्रेजों की कूटनीति चालों से जब हमारा देश हीनता के इस अवसाद में डूबा हुआ था, तो देश के पुनरुत्थान की सब आशाएं समाप्त हो गई थीं। कोई देश गिरकर उठता है स्वदेशाभिमान और जातीय गर्व के प्रकाश में पनपे आत्मगौरव से, पर हीनता की उस घनी आंधी में स्वदेशाभिमान और जातीय गौरव के दीपक कहां जल सकते थे ? ऋषि दयानन्द के आत्मतेज की बलिहारी कि उन्होंने नई पृष्ठभूमि की खोज की और अतीत गौरव की उपजाऊ भूमि में स्वाभिमान और स्वदेशाभिमान के वृक्ष रोपे।

शीघ्र ही इन पर जागरण और उद्बोधन के पुष्प महके और देश विचार-क्रान्ति से उद्बुद्ध हो उठा। सरदार अर्जुनसिंह ने ऋषि दयानन्द को देखा तो आकर्षित हुए, उनका भाषण सुना तो प्रभावित हुए और बातचीत की तो पूरी तरह उनके हो गए। सरदार अर्जुनसिंह इस विशाल देश के पहले सिख नागरिक थे, जो इस विचार क्रान्ति में भागीदार हुए। उनमें धुन थी, देशभक्ति की, आस्था की, कर्मठता थी; वे शीघ्र ही अपने क्षेत्र में इस विचार क्रान्ति का यज्ञ-मण्डप बन गए।
सरदार अर्जुनसिंह के घर में तीन पुत्र जन्मे—सरदार किशनसिंह, सरदार अजीतसिंह, सरदार स्वर्णसिंह।
सरदार किशनसिंह का व्यक्तित्व समुद्र की तरह विस्तृत और गहरा था। लोकमान्य तिलक से लेकर महात्मा गांधी के सब आन्दोलनों में उन्होंने पूरे जोश से हिस्सा लिया। दूसरी दिशा में जो विद्रोह और क्रान्ति के तूफान उठे, चाहे वह लार्ड हार्डिग पर फेंके गए बम का मुकदमा था, चाहे ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ की पहली किसान-क्रान्ति, चाहे जेलों में मानवीय अधिकारों का संघर्ष। और चाहे गदर-आन्दोलन, वे उन सब के भी सहयोगी-सलाहकार रहे।

सरदार अजीतसिंह ने अपना सार्वजिनक जीवन आरम्भ तो किया कांग्रेस के आन्दोलन से, पर शीघ्र ही उनका विकास एक नई दिशा में बदल गया। देश में चाफेकर-बन्धुओं के क्षरा पूना में 22 जून 1917 को प्लेग-कमिश्नर रैण्ड और लैफ्टीनैण्ट मिस्टर आयर्स की हत्या कर सशस्त्र विद्रोह (जिसे बोलचाल की भाषा में आतंकवाद कहा गया है) की नींव रखी गई थी। सरदार अजीतसिंह ने उस धारा से स्वतन्त्र देशव्यापी जन-क्रान्ति (1857 के गदर की पूर्णता) की नींव रखी। उनका व्यक्तित्व इतना प्रचण्ड था कि यह नींव शीघ्र ही एक भवन का रूप लेने लगी।


इस भवन का नक्शा कितना विशाल था, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि सरदार अजीतसिंह ने अपनी क्रांति-संस्था ‘भारतमाता सोसायटी’ के द्वारा प्रथम विश्वयुद्ध का (जब किसी दूसरे के स्वप्न में भी वह न आया था) यथार्थ अनुमान कर अपने सहकर्मी लाला हरदयाल को अमेरिका, सूफी अम्बाप्रसाद को अफगानिस्तान-ईरान, सरदार निरंजन सिंह को ब्राजील और इसी तरह कई दूसरे साथियों को दूसरे देशों में भेजने का निश्चय किया कि ये लोग विदेशों में सशस्त्रशक्ति का संगठन करें, जो युद्ध के समय भारत के भीतर उभरी शक्ति से आ मिलें। स्वयं सरदार अजीतसिंह भारत में ही रहे और यहीं सेनाओं और राजनेताओं के साथ लेकर जन-क्रान्ति की तैयारी करें। परिस्थितियां ऐसी हुई कि सरदार अजीतसिंह को भी विदेश जाना पड़ा। वहां उन्होंने 39 साल तक भारतीय क्रान्ति की ज्वाला जलाई और दोनों विश्वयुद्धों में सबसे पहले आज़ाद हिन्द सेना का संगठन किया।

सरदार स्वर्ण सिंह भारतमाता के द्वारा क्रान्ति की रोशनी घर-घर पहुंचाने वाले मशालची थे। वाणी और कलम दोनों उनके अस्त्र थे। जेल की यातनाओं ने उन्हें तोड़ दिया और वे 23 वर्ष की भरी जवानी में शहीद हो गए।
सरदार किशनसिंह के घर में जन्में भगतसिंह। उनकी मृत्युंजयी वीरता का जन-मानस पर ऐसा सिक्का बैठा कि आतंकवादी धारा को अपने चाचा सरदार अजीतसिंह द्वारा स्थापित जन-क्रान्ति की धारा में बदल देने का उनका ऐतिहासिक कार्य सबकी आंखों से ओझल ही रह गया। देश की नयी पीढ़ी को यह बाताया ही नहीं गया कि भारत का प्रथम संविधान सरदार अजीतसिंह ने ही लिखा था और देश की नई पीढ़ी को यह भी नहीं बताया गया कि सरदार भगतसिंह ही इस देश में समाजवाद के प्रथम उद्घोषक थे।

युग बीत गए सरदार अजीतसिंह के कार्य को और युग बीत गए भगतसिंह के कार्य को, पर उनके कार्यों का पूर्ण चित्र हमारे राष्ट्रीय साहित्य में प्रस्तुत ही नहीं हुआ। यह तब तक संभव नहीं था, जब तक कोई सरदार अर्जुनसिंह से लेकर भगतसिंह तक के युग को अपने में न पचा ले। यह काम आसान नहीं था, पर मुझे औरों की अपेक्षा एक सुविधा थी कि मेरा जन्म इसी क्रान्ति-जनक वंश में हुआ है। मुझे जहां घर में सुरक्षित साहित्य का लाभ उठाने की भी औरों से अधिक सुविधा थी। साहित्य में बिखरे टुकड़ों और खण्डित संकेतों में पहले जो कुछ लिखा गया, वह भी मुझे सुलभ था।
इस सब को मिलाकर मैंने अपने देश की क्रान्ति के इन अग्रदूतों की कहानी इस ग्रन्थ में प्रस्तुत की है कि ये लोग इन पृष्ठों में अपने जीते-जागते रूप में पाठकों को मिले; उनकी भाषण-प्रतिमाएं ही पाठकों के सामने प्रतिष्टित न हों। मेरा विश्वास है कि आप इन पृष्ठों में क्रान्ति के इन कर्णधारों से बातें करेंगे, उनके कामों में रस लेंगे, उनके साथ हंसेंगे, उनके साथ तपेंगे और इस प्रकार वर्तमान में ही अतीत के उस क्रांतिकारी संघर्ष में मानसिक रूप से हिस्सेदार होंगे।
सरदार अर्जुनसिंह, सरदार किशनसिंह, सरदार अजीतसिंह, सरदार स्वर्णसिंह, सरदार भगतसिंह; अपने क्षेत्र में, अपने ढंग पर राष्ट्रीय स्वतंत्रता की क्रान्ति-साधना करने वाले इन वीरों की, इनके कार्यों की कहानी कहना ही मेरा उद्देश्य था, पर ज्यों-ज्यों मैं उनके गहराई में उतरती, मुझे अनुभव हुआ कि श्रीमती हुकम कौर को इस कहानी से अलग रखना इतिहास के साथ अन्याय होगा ही, अमानवीय भी होगा।

ठीक है कि क्रान्ति की वेदी पर तपे ये वीर, ही, उस वेदी की लपटों से उनकी सहधर्मणियों को ही क्या सबसे अधिक झुलसना नहीं पड़ा ? ठीक है कि सबकों दूर से क्रान्ति की मशाल दिखाई देती है और वे हाथ भी, जो मशाल को थामे रहते हैं, पर उस मशाल को रौशन तो रखते हैं तिल-सरसों के वे दाने ही, जो कोल्हू में पिस कर उस मशाल की लौ को प्रदीप्त रखने के लिए अपना तेल दे, अपने को निःसत्व कर लेते हैं ! इसी अनुभूति ने उन्हें भी इस कहानी में प्रतिष्ठित कर दिया है।
इतना तो स्पष्ट है ही कि यह एक ही वंश के लोगों की गाथा होकर भी किसी वंश की गाथा नहीं है; यह तो उन युगों की ही गाथा है। नामों का महत्त्व तो यही है कि वे प्रतीक हो गए हैं अपने युगों के। इन पृष्ठों में भी जहां मैंने नाम लिए हैं, उनका यह मतलब नहीं कि उस काल के कार्यों में वे ही सर्वेसर्वा थे। कौन कहेगा इस पर हां ? पर हां वे ही प्रमुख थे, प्रेरक थे, निमित्त थे, तो उनके नाम से बात कहनी होती है कि जिस अध्ययन से वे इस परिणाम पर पहुंचे कि समानता ही समाज के सब रोगों की दवा है, उसमें श्री सुखदेव, श्री भगवती चरण वोहरा, श्री विजय कुमार सिन्हा और श्री शिव वर्मा जैसे साथियों का पूरा योग था। भगतसिंह ने ऊंचे स्वर में, ऊंचे स्थान से, ऊंचे विश्वास के साथ, उसकी घोषणा की, इसलिए वे ही उसका प्रतीक हो गए। साण्डर्स-वध का प्रस्ताव भगतसिंह का था, साण्डर्स-वध भी भगतसिंह ने (राजगुरु के साथ) किया था, पर हम सब जानते हैं कि उसकी व्यूह रचना चन्द्रशेखर आज़ाद ने की थी। असेम्बली में बम फेंकने का प्रस्ताव भगतसिंह का था। बम फेंके भी भगतसिंह ने ही थे, पर उसकी व्यूह-रचना में पार्टी के अनेक साथियों ने तर्क-वितर्क किया था और तब यह योजना पूर्ण हुई थी।

सशस्त्र क्रान्ति की चर्चा करते हुए कुछ लेखकों ने उन युगों को, जिन की चर्चा ग्रन्थ में है, अजीतसिंह-युग और भगतिसिंह-युग कहा है, पर मैंने इसे ग्रहण नहीं किया। मैंने 1947 में बंटवारे के दुख झेले हैं, इसलिए मैं बंटवारे में विश्वास नहीं करती और इतिहास को भी उसके सम्पूर्ण रूप में ही देखती हूं। मेरा मन तो भारत की स्वतन्त्रता के इतिहास को हिंसा–अहिंसा के टुकड़ों में भी बांट कर नहीं देखना चाहता। मैं अपनी जगह स्पष्ट हूं कि राष्ट्र की स्वतन्त्रता में हिंसा ने अपना काम किया है और अहिंसा ने अपना। यही नहीं, दोनों ने एक-दूसरे को काफी हद तक प्रभावित भी किया है। इनमें भारत से एक ही धारा को पकड़कर भारत की स्वतन्त्रता का सच्चा इतिहास लिखा जा सकता है, मुझे इसमें विश्वास नहीं है।
अपनी गाथा को आगे बढ़ाने के लिए मैंने अनेक विश्लेषण किए हैं और अनेक निष्कर्ष निकाले हैं। विद्वानों की आलोचना से वो झूठे या गलत सिद्ध हो जायें, तो सब से पहले और सबसे अधिक प्रसन्नता मुझे होगी। मेरा उद्देश्य अपने निष्कर्ष समाज पर थोपना नहीं, अन्तिम निष्कर्षों की खोज का भाव पैदा करना है। विचार विमर्श से जो नए निष्कर्ष स्थापित होंगे, मैं उन्हें तुरंत स्वीकार कर लूंगी, मुझे अपनी सीमा का ज्ञान है, और अपने ज्ञान की सीमा का भी।

यह कोई शोध-ग्रन्थ नहीं है, यह तो बोध-ग्रन्थ है, जो भगतसिंह और उसके पुरखों की जीवनगाथा के रूप में ही पहली बार देश की नयी पीढ़ी के सामने रख, उनसे कहता है कि देश की स्वतन्त्रता लाने के लिए यह सब हुआ था और उसे बचाने के लिए भी यह सब आवश्यक है। मुझे इतिहास लेखक होने का दावा नहीं है। हां, इतिहास की पवित्रता को पूरी तरह सुरक्षित रखते हुए मैंने तो जीवन ही ग्रहण किया है। इससे नयी-पीढ़ी के युवक-युवती उलझनों से बचेंगे और बलिदान की उस भावना को ग्रहण करेंगे, जो स्वयं इतिहास की रचना करती है, इतिहास को नया मोड़ देती है और एक कमजोर आदमी को भी जुझारू बनाती है।

इन पृष्ठों में जो फूल चुने गए हैं, वे बाग-बाग के हैं। मैं उन फूलों की विधाता होने का श्रेय नहीं ले सकती; क्योंकि उन्हें न मैंने सींचा है, न पाया है। मैंने तो उन्हें एक गुलदस्ते में लगा दिया है। स्मृतियों के इन फूलों में सत्य और सत्व इतिहास का है, उन स्मृतियों के संरक्षण का है, शिल्प मेरा है। दूसरे शब्दों में स्वर्ण खान का है, गढ़ाव और कहीं कहीं जड़ाव मेरा है।

नम्रता के साथ इतना अवश्य कह सकती हूं कि राष्ट्र की स्वतंत्रता के इतिहास में सरदार अर्जुनसिंह, किशनसिंह, सरदार अजीतसिंह और सरदार भगत सिंह का जो दान है, उसे नेताओं ने ही नहीं, इतिहास के लेखकों ने भी भुला दिया है और भगतसिंह पर भी जिन्होंने लिखा है, उनके पास उनके व्यक्तित्व का कोई पूर्ण चित्र न था। इस स्थिति में उनकी पूर्ण प्रतिभा का सर्जन किसी के लिए सम्भव ही न था ! भगतसिंह सशस्त्र क्रान्ति के प्रतीक हो गए और उनका चित्र घर-घर में पहुंच गया। इससे स्पष्ट है कि उनके प्रति जनता के मन में ऊंचा भाव उनके बलिदान के प्रति आदर-मूलक है। मेरा प्रयत्न रहा है कि यह ऊंचा भाव यथार्थ पर आश्रित होकर ठोस बन जाए। दूसरे शब्दों में देश की नयी पीढ़ी उनके नाम से नहीं उनके कामों से प्रेरणा ले और सोचे कि ऐसा हमें भी करना चाहिए, हम भी कर सकते हैं।

देश की नयी पीढ़ी को आदर्श अनुप्राणित करते हैं। वे आदर्श जीवित व्यक्तियों के जीवन में हो या इतिहास के स्वतन्त्रता के बाद के अधिकांश सैनिक ऐसे रूप में नयी पीढ़ी के सामने आए कि उसके आदर्श न बन सके। इससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह हुआ कि नयी पीढ़ी के सामने स्वतंत्रता के लिए किए गए उनके संघर्षों और बलिदान का इतिहास भी प्रस्तुत न हो सका। परिणाम यह हुआ कि उसकी प्रेरणा के स्रोत ही सूख गए। स्वतंत्र भारत के जीवन का यह एक बहुत कड़ा सत्य है कि हमने अपने इतिहास के साथ गद्दारी की है, अपने शहीदों के साथ गद्दारी की है। इसका ज्ञान तो मुझे था, पर साक्षात्कार हुआ 1963 से 1968 तक के समय में, जब मैं इस ग्रन्थ की तैयारी और लेखन में जुटी रही। विचार और घटना की एक-एक कड़ी जोड़ने में मुझे महीनों लग जाते पर कड़ी न मिलती। लम्बा पत्र-व्यवहार करना पड़ता और मात्र उन लोगों से संपर्क साधना पड़ता, जिनकी स्मृतियां ही इस इतिहास का एक मात्र अभिलेखागार (नेशनल आरकाइव्स) हैं। यह देखकर मन दुःख से भर जाता है कि ये स्मृतियां भी अस्तव्यस्त होती जा रही हैं।

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