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भारत की एकता का निर्माण

सरदार पटेल

प्रकाशक : प्रकाशन विभाग प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :350
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 62
आईएसबीएन :

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स्वतंत्रता के ठीक बाद भारत की एकता के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा देश की जनता को एकता के पक्ष में दिये गये भाषण


(२२)  

राष्ट्रीय मजदूर-संघ का दूसरा अधिवेशन
इन्दौर
७ मई, १९४९

स्वागत समिति के प्रमुख साहब, सम्मेलन के सदर साहब, प्रतिनिधि भाइयो और बहनो!

हमारे राष्ट्रीय मजदूर संघ का यह दूसरा अधिवेशन है। पहला जल्सा बम्बई में हुआ था, जिसमें राष्ट्रपति डा० राजेन्द्रप्रसाद ने संघ का उद्धाटन किया था और आज के जलसे के सदर साहब उस जलसे के भी सदर थे। इन्दौर मजदूरों के संगठन के लिए एक मशहूर जगह है, क्योंकि इन्दौर के मजदूरों ने अहमदाबाद के मजदूर संगठन से अपना पार्ट ले लिया है।

मैं आप लोगों को संक्षेप में यह बताना चाहता हूँ कि हमारे मुल्क में मजदूरों का संगठन किस तरह से शुरू हुआ, जिससे मजदूरों की आज तक की हालत का और मजदूरों के आन्दोलन का आपको ख्याल हो जाएगा। हिन्दुस्तान में सब से पहले सन् १९२० में ट्रेड यूनियन कांग्रेस की नींव डाली गई। उसके पहले ट्रेड यूनियन हिन्दुस्तान में नहीं थे। लेकिन उससे भी पहले अहमदाबाद में मजदूर संगठन का जन्म हुआ था। वह मजदूर संगठन महात्मा गांधी जी की सलाह से, उनके आशीर्वाद से और उनकी रहनुमाई से चलता था। उन्हीं की गाइडेन्स से वह शुरू हुआ था। यह जान कर आपको आश्चर्य होगा कि उसकी शुरुआत एक अमीर मिल मालिक के कुटुम्ब की लड़की ने की थी। अहमदाबाद का एक कड़ा जबरदस्त इण्डस्ट्रियलिस्ट, जिसका नाम सेठ अम्बालाल साराभाई है और जिसकी बड़ी-बड़ी मिलें अहमदाबाद में हैं, उनकी बहन अनुसुइया बाई ने इस मजदूर-संघ को बनाया और महात्मा गान्धी जी ने उनको आशीर्वाद दिया। अनुसुइया बहन को अहमदाबाद के मजदूर देवी कहकर बुलाते थे। उसके साथ उनके साथी शंकरलाल बैंकर थे और हम लोग भी उस संगठन में शरीक हुए और साथ देने लगे। हमारे लिए वह नई बात थी, क्योंकि अहमदाबाद के किसी कारखाने में मजदूरों का कोई संगठन नहीं था। कारखानों के मालिक जैसे मिलमालिक कहे जाते हैं, वैसे ही उन्हें मजदूरों के मालिक भी कहा जा सकता था, ऐसी हालत थी। उस समय इस संगठन का जन्म हुआ। ट्रेड यूनियन कांग्रेस के जन्म से भी करीब तीन साल पहले इस मज़दूर संघ की नींव डाली गई।

उधर महात्मा जी ने चम्पारन में सब से पिछड़े हुए लोगों में काम करना शुरू किया। किसान लोग और जिनके पास जमीन नहीं है, ऐसे मजदूर लोग तथा गली के कारखानों में काम करनेवाले मजदूरों में गान्धी जी ने काम शुरू किया। इन गली के कारखानों में जिस प्रकार की मेहनत ली जाती थी, वह तो जिन लोगों ने उसका अनुभव किया हो, उन्हें ही मालूम हो सकता है। मिलों मे काम करनेवाले मजदूरों से भी ज्यादा कष्ट में ये लोग थे। जब गान्धी जी ने वहां आन्दोलन शुरू किया तो अहमदाबाद की मिलों में आन्दोलन शुरू हो गया। गुजरात के केरा जिले में किसानों से ज्यादा लगान लिया जाता था, उसके लिए वहां भी आन्दोलन शुरू हुआ। हमारे राष्ट्र का सच्चा जीवन वहाँ से शुरू हुआ। तो तीन चीज़े साथ-साथ चलीं। आज आप वहाँ बिहार में जाएँ, तो आपको मालूम होगा कि गली का एक भी कारखाना वहाँ नहीं रहा। सब उठ गए। गान्धी जी के आन्दोलन का यह परिणाम निकला कि किसान, जो गुलाम थे, फँसे हुए थे और जिनसे जबरदस्ती काम लिया जाता था, काम छोड़कर चले गए। मजदूरों से बहुत थोड़े वेतन पर और जबरदस्ती काम लिया जाता था, वह सब खत्म हो गया। इसी प्रकार आप देखें केरा जिले में भी आज जो किसान है, वह एक तरह से अपना राज चला रहे हैं, उनको लगान के लिए कोई आन्दोलन करने की जरूरत अब नहीं पड़ती। तीसरा अहमदाबाद का यह मजदूर-संगठन है। अहमदाबाद में जो मज़दूर संगठन है, वैसा संगठन दुनिया भर में और किसी जगह नहीं है, यह मेरा दावा है। मैंने उसमें बहुत काम किया है। ट्रेड यूनियन में जितनी गलतियां हैं, उन गलतियों को गान्धीजी ने पूरी पूरी तरह समझ लिया था। तो जितना उसमें मैल है, वह निकाल कर हिन्दुस्तान की संस्कृति के अनुकूल उसी के ढंग से, एक मज़दूर आन्दोलन वहां शुरू किया।

सब से पहली बार मजदूरों ने अहमदाबाद में ही अपनी तनख्वाह बढ़ाने के लिए हड़ताल शुरू की। तब तक हिन्दोस्तान में किसी कारखाने में कभी हड़ताल नहीं हुई थी। यदि मजदूर हड़ताल करते, तो पुलिस डंडा लेकर आती और मिल मालिक जो हुक्म देता, उसी के हुक्म के मुताबिक काम करती। जब यह आन्दोलन शुरू हुआ और मजदूरों ने जो हड़ताल शुरू की, तो मजदूरों में नई जागृति आ गई, क्योंकि उनकी पीठ पर मिल मालिक की अपनी बहन थी जो स्वयं एक करोड़पति की लड़की थी। साथ में एक बड़े राष्ट्रीय सेवक शंकरलाल बैंकर थे, जो कांग्रेस के एक लीडर थे। हम लोग भी उसमें थे और हम सब के साथ सबको सलाह देने वाले गान्धी जी थे। खैर जब थोड़े दिन हड़लाल चली और एक हफ्ता भी पूरा नहीं बीतने पाया था कि मजदूर लोग कुछ कमजोर पड़ने लगे। उन दिनों मिल-मालिक के हाथ में काफी सत्ता थी, और वे मजदूरों में परस्पर काफी फूट-फाट करा सकते थे। उधर मजदूरों का कोई पक्का संगठन तक नहीं था। सो वह डरने लगे और घबरा गए। जब गान्धी जी को मालूम पड़ा कि मजदूर लोग अपनी प्रतिज्ञा तोड़ कर कारखाने में जाने वाले हैं तब गान्धी जी ने साबरमती नदी के मैदान में मजदूरों की एक सभा बुलाई और वहां उनसे कहा कि हिन्दुस्तान में यह मजदूरों का पहला संगठन है। यदि आप लोग अपनी प्रतिज्ञा से हट जाएँगे और गिर जाएँगे तो हिंदुस्तान में मजदूरों के हितों को बहुत नुकसान पहुँचेगा। इसलिए आपको अपने मार्ग से हटना नहीं चाहिए। जो हड़ताल की प्रतिज्ञा आपने ली है, उसे आप पूर्ण करें। लेकिन इस पर भी मजदूर इसके लिए तैयार नहीं थे। वे बहुत कमजोर पड़े। तब उसी समय गान्धी जी ने प्रतिज्ञा की कि जब तक आप लोगों के बीच में और मिल मालिकों के बीच में मानपूर्वक समझौता न हो जाए, तब तक आपको काम पर वापस नहीं जाना चाहिए और आप में से कोई जाएँगे, तो मुझे अनशन करके, फाका करके, मरना पड़ेगा। हिन्दुस्तान में मजदूरों के हितों के लिए गान्धी जी की वह पहली प्रतिज्ञा थी। गान्धी जी ने वहाँ फाका करना शुरू किया। जब इस फाके को ५, ६ दिन बीत गए तो हम सब को बहुत चिन्ता हुई। रात दिन हम लोग परेशान रहने लगे। मजदूर भी परेशान थे और कई मालिक भी परेशान थे। आखिर एक हफ्ते की मेहनत बाद एक बड़ा सिद्धान्त का आविष्कार हुआ, जिससे मिल-मालिक और मजदूरों के बीच में समझौता हो गया। यह समझौता इस तरह से हुआ कि मालिक मजदूरों के बीच में कोई झगड़ा हो तो उस का फैसला हड़ताल से नहीं, मार पीट से नहीं, जबरदस्ती से नहीं, बल्कि पंचायत से होना चाहिए। मजदूर और मालिक मिलकर एक सरपंच रख दें और उनका जो फैसला हो, वह मान लिया जाय। अब, हिन्दुस्तान की मज़दूर जनता में वह पहला फैसला था, जिसने सारे मज़दूरों में एक नई जान डाल दी। मिल-मालिकों ने आखिर यह चीज कबूल की।

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    अनुक्रम

  1. वक्तव्य
  2. कलकत्ता - 3 जनवरी 1948
  3. लखनऊ - 18 जनवरी 1948
  4. बम्बई, चौपाटी - 17 जनवरी 1948
  5. बम्बई, शिवाजी पार्क - 18 जनवरी 1948
  6. दिल्ली (गाँधी जी की हत्या के एकदम बाद) - 30 जनवरी 1948
  7. दिल्ली (गाँधी जी की शोक-सभा में) - 2 फरवरी 1948
  8. दिल्ली - 18 फरवरी 1948
  9. पटियाला - 15 जुलाई 1948
  10. नई दिल्ली, इम्पीरियल होटल - 3 अक्तूबर 1948
  11. गुजरात - 12 अक्तूबर 1948
  12. बम्बई, चौपाटी - 30 अक्तूबर 1948
  13. नागपुर - 3 नवम्बर 1948
  14. नागपुर - 4 नवम्बर 1948
  15. दिल्ली - 20 जनवरी 1949
  16. इलाहाबाद - 25 नवम्बर 1948
  17. जयपुर - 17 दिसम्बर 1948
  18. हैदराबाद - 20 फरवरी 1949
  19. हैदराबाद (उस्मानिया युनिवर्सिटी) - 21 फरवरी 1949
  20. मैसूर - 25 फरवरी 1949
  21. अम्बाला - 5 मार्च 1949
  22. जयपुर - 30 मार्च 1949
  23. इन्दौर - 7 मई 1949
  24. दिल्ली - 31 अक्तूबर 1949
  25. बम्बई, चौपाटी - 4 जनवरी 1950
  26. कलकत्ता - 27 जनवरी 1950
  27. दिल्ली - 29 जनवरी 1950
  28. हैदराबाद - 7 अक्तूबर 1950

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