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इतिहास और राजनीति >> भारत की एकता का निर्माण

भारत की एकता का निर्माण

सरदार पटेल

प्रकाशक : प्रकाशन विभाग प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :350
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 62
आईएसबीएन :

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स्वतंत्रता के ठीक बाद भारत की एकता के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा देश की जनता को एकता के पक्ष में दिये गये भाषण


उसके बाद १५, २० सालों तक गान्धी जी ही मजदूरों की तरफ से पंच रहे। मिल-मालिकों और मज़दूरों के बीच जितने झगड़े होते रहे, उनका फैसला मजदूरों की तरफ से गान्धी जी और मिल-मालिकों की तरफ से मिल-मालिक मण्डल का प्रमुख मिलकर करते रहे। उसके बाद किसी और निष्पक्ष पुरुष को रख दिया गया। लेकिन उसका नतीजा यह हुआ कि अहमदाबाद में कम से कम हड़तालें हुईं और अहमदाबाद का उद्योग सब से ज्यादा आगे बढ़ने लगा। इसी बीच में, शुरू ही से अहमदाबाद के मिल मजदूरों का एक प्रकार का यह सौभाग्य था कि उनको गुलजारीलाल नन्दा मिल गया। नन्दा पंजाब से एम. ए० की डिग्री लेकर सब काम छोड़ अहमदाबाद आकर बैठ गया, और उसने अपना जीवन मज़दूरों के काम के लिए अर्पण कर दिया। उसके बाद खंडू भाई आया। कुछ और लोग भी वहां से मिले, और मजदूरों का संगठन पक्का बन गया। लेकिन आज तक भी अहमदाबाद में कभी मज़दूरों पर गोली चलाई गई हो, ऐसी बात सुनने में नहीं आई। हमारी पुलिस को हमारे मज़दूर पर गोली चलानी पड़े, उससे ज्यादा शरम की बात कोई नहीं हो सकती। तो इस प्रकार अहमदाबाद में जो एक मजदूर संगठन बना, मैं चाहता हूँ वैसा सच्चा ट्रेड यूनियन हिन्दुस्तान भर में चले।

अहमदाबाद के मज़दूर-संगठन की स्थापना के तीन साल के बाद एक ट्रेड यूनियन कांग्रेस हुई। लाला लाजपतराय उसके प्रधान हुए। यह एक आल इण्डिया जल्सा था। अब एक स्थाई आल इण्डिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस बन दी गई। आगे चलकर पण्डित जवाहरलाल इस आल इण्डिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस के प्रधान बने। उसके बाद बाबू सुभाष चन्द्र बोस प्रधान बने और उसके बाद हमारे आज के सदर भी उसके प्रधान बने। लेकिन अहमदाबाद का ट्रेड यूनियन, जो एक सच्चा ट्रेड यूनियन था, जो मजदूरों का अपना संगठन था वह उससे अलग ही रहा। क्यों अलग रहा? क्योंकि हम लोगों ने सोचा? भारत में पाश्चात्य ढंग पर जो ट्रेड यूनियन बन रहा है, उस पर तो परदेशी ढंग के ट्रेड यूनियनों का ज्यादा असर रहेगा। हम यही समझे कि हमें उससे अलग रहना ही अच्छा है, क्योंकि उनका मन्तव्य है कि अपना ध्येय प्राप्त करने के लिए वे चाहे कोई मीन्स (उपाय) उपयोग करें, चाहे कोई हथियार उपयोग में लाएँ, वह उपाय स्वच्छ हो, ऐसी उनको परवाह नहीं। मानना यह भी है कि ज्यादातर तो अस्वच्छ हथियार से ही जल्दी काम है। नतीजा यह हुआ है कि हर रोज ट्रेड यूनियन और मिल मालिकों में झगड़ा होता रहता है और हड़ताल करने की कोशिश जारी रहती है। आज की हालत तो ऐसी हो गई है कि पुलिस को गोली चलाने पर मजबूर किया जाता है। यह सब गांधी जी ने पहले से देख लिया था। उन्होंने सलाह दी कि इस ट्रेड यूनियन में जाने का कोई फायदा नहीं। वहाँ तब जाना चाहिए जब हमारी मेजोरिटी (बहुमत) वहां हो, हमारे बहुमत से अच्छा काम चल सकता हो, और उन लोगों को हम कुछ कन्ट्रोल (नियन्त्रण) में रख सकें। वैसी हालत हो, तब हमें वहां जाना चाहिए, नहीं तो नहीं।

तो हम अहमदाबाद में, गुजरात में और जगहों पर भी अपनी रीति से काम कर रहे थे। हमने यह देखा कि हमारे मुल्क में मजदूरों में काम करनेवाले समझदार लोग बहुत कम हैं। तब हमने निश्चय किया कि अच्छे कार्यकर्ता (वर्कर्स) तैयार करने चाहिए। हमने देखा कि अहमदाबाद के संगठन के रूप से तब तक ढंग से काम करने वाले मेहनती लोग हमें न मिलें, हमारा काम नहीं चलता। इसलिए, हमने एक हिन्दुस्तान मजदूर संघ तैयार किया। यह एक अलग संस्था थी, उसमें केवल कार्यकर्ताओं को शिक्षण दिया जाता था और बताया जाता था कि मजदूरी में किस तरह से काम हो सकता है, जिससे मजदूरों को फायदा हो, और मुल्क को भी फायदा हो। उस ढंग से हमने काम शुरू किया। उसमें मैं खुद भी था, डा० राजेन्द्रप्रसाद थे, शंकरराव देव थे, जय-रामदास थे, और कांग्रेस के बाकी कितने ही मित्र भी थे। गुलजारीलाल नन्दा और खंडूभाई भी थे। हम लोगों ने अहमदाबाद में कितने ही वर्कर्स को तैयार किया और उन्हें बाहर प्रान्तों में भेजा जाने लगा। ये लोग अपने अपने ढंग से काम करने लगे। यदि इन्दौर में से भी कोई भाई आए होंगे और वहां शिक्षा ली होगी, तो उन्हें भी उस का अनुभव होगा। इन्दौर में जो संगठन चलाता है, उसने अपनी शिक्षा वहां ही से पाई है। उसका तो जन्म ही से पूरा सम्बन्ध अहमदाबाद के संगठन से है। अब सारे हिन्दुस्तान की सत्ता हमारे हाथ में आई है। आप लोगों को मालूम ही है कि सन् १९४२ में हमने एक आखिरी लड़ाई ब्रिटिश सल्तनत के साथ हिन्दुस्तान की आज़ादी के लिए लड़ी। इस लड़ाई के सिलसिले में जब हम लोग जेल में गए, जब गान्धी जी को जेल में डाले जाने पर अहमदाबाद के मजदूरों ने जो काम करके दिखाया, उतना काम हिन्दुस्तान भर में कम लोगों ने दिखाया था। कोई अण्डर ग्राउण्ड चले गए, कोई हवा में चले गए, कोई और जगह पर चले गए, लेकिन अहमदाबाद के इन मजदूरों ने जो काम किया, वैसा काम और लोगों ने किया होता तो हमारा काम तीन महीनों में खत्म हो जाता और इसमें तीन साल न लगाने पड़ते। आज कई लोग कहते हैं कि वह मजदूर संगठन ही कैसा है, जो हड़ताल के खिलाफ है? सचमुच आज हम लोग हड़ताल के खिलाफ हैं। लेकिन जब हड़ताल करने का मौका था, तब इन लोगों ने तीन महीने तक हड़ताल की थी। जब गवर्नमेण्ट के साथ लड़ना था, तब वे सब लोग भाग गए थे और हमने हड़ताल की थी। आज जब मुल्क में हड़ताल की जरूरत नहीं है, तब वे हड़ताल हड़ताल चिल्लाते हैं। इस तरह से हम लोग काम नहीं करते। तो मैं आपसे यह कहना चाहता हूँ कि जैसा शिक्षण, राष्ट्रीय शिक्षण, और जैसा सही संगठन अहमदाबाद में मिलता है, और जगह नहीं मिलता।

आज हमारे पास देश की पूरी सत्ता आई है, कांग्रेस की गवर्नमेण्ट बन गई है और परदेशी सल्तनत देश से चली गई है, तो हालत ही बदल गई है। यह देश के राजा-महाराजा, जिनके पास सत्ता थी, उन्होंने भी जनता से कह दिया कि अब तुम शासन चलाओ, तो इन कारखाने के मालिकों के साथ लड़ने की बात ही क्या रह गई है। आज हमारे मजदूरों के मिलमालिकों से कोई शिकायत हो तो उन्हें हमारे पास आना चाहिए। जो कुछ उन्हें लेना है, वह हम से लेना है, कारखानों के मालिकों से भला क्या लेना है। क्योंकि सत्ता तो अब हमारे पास है। पुलिस हमारी है, सारी फौज हमारी है, सारा खजाना हमारा है। कौन सी चीज़ अब मिल मालिकों के पास है कि जिसके लिए आप कहते है कि हम उनसे लड़ेंगे और हड़ताल करेंगे। हां, अब भी जो हड़ताल कराते हैं उसके पीछे एक चीज़ है कि वे लोग कांग्रेस को वोट में तो हरा नहीं सकते, इसलिए कांग्रेस को हटाने का एक ही तरीका उन्हें समझ आता है कि मुल्क में गड़बड़ कराओ, अशान्ति पैदा करो, और रेल की पटरी उखाड़ दो। इस प्रकार की हड़ताल कराओ कि राज-शासन चले ही नहीं। यह कम्यूनिस्टों का काम है। तब हमने सोच लिया कि डन कम्यूनिस्टों के साथ ट्रेड यूनियन में बैठना मुल्क के लिए बहुत बड़ी खतरनाक चीज है। इसलिए हमने अलग रहने का फैसला किया।

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    अनुक्रम

  1. वक्तव्य
  2. कलकत्ता - 3 जनवरी 1948
  3. लखनऊ - 18 जनवरी 1948
  4. बम्बई, चौपाटी - 17 जनवरी 1948
  5. बम्बई, शिवाजी पार्क - 18 जनवरी 1948
  6. दिल्ली (गाँधी जी की हत्या के एकदम बाद) - 30 जनवरी 1948
  7. दिल्ली (गाँधी जी की शोक-सभा में) - 2 फरवरी 1948
  8. दिल्ली - 18 फरवरी 1948
  9. पटियाला - 15 जुलाई 1948
  10. नई दिल्ली, इम्पीरियल होटल - 3 अक्तूबर 1948
  11. गुजरात - 12 अक्तूबर 1948
  12. बम्बई, चौपाटी - 30 अक्तूबर 1948
  13. नागपुर - 3 नवम्बर 1948
  14. नागपुर - 4 नवम्बर 1948
  15. दिल्ली - 20 जनवरी 1949
  16. इलाहाबाद - 25 नवम्बर 1948
  17. जयपुर - 17 दिसम्बर 1948
  18. हैदराबाद - 20 फरवरी 1949
  19. हैदराबाद (उस्मानिया युनिवर्सिटी) - 21 फरवरी 1949
  20. मैसूर - 25 फरवरी 1949
  21. अम्बाला - 5 मार्च 1949
  22. जयपुर - 30 मार्च 1949
  23. इन्दौर - 7 मई 1949
  24. दिल्ली - 31 अक्तूबर 1949
  25. बम्बई, चौपाटी - 4 जनवरी 1950
  26. कलकत्ता - 27 जनवरी 1950
  27. दिल्ली - 29 जनवरी 1950
  28. हैदराबाद - 7 अक्तूबर 1950

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