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इतिहास और राजनीति >> भारत की एकता का निर्माण भारत की एकता का निर्माणसरदार पटेल
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स्वतंत्रता के ठीक बाद भारत की एकता के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा देश की जनता को एकता के पक्ष में दिये गये भाषण
तब हमारे सोशलिस्ट भाई भी हमारे साथ थे। जब मैं जेल से छूट कर आया, तब मैंने सोशलिस्ट भाइयों से भी कहा कि अब अँग्रेजों के साथ हमें लड़ना नहीं है, वह लोग चले ही जानेवाले हैं, और आप खली भ्रम में पड़े हैं। वे लोग मुझ से कहने लगे कि आप लोग उनकी यह बात कैसे मानते है? यह बात हमारे मानने में तो आती नहीं कि वे जाने वाले हैं, आप लोग धोखे में पड़े है। मैंने बहुत समझाने की कोशिश की, लेकिन उनका दिल नहीं मानता था। आखिर मौका आने पर इन लोगों को कबूल करना पड़ा कि आप ठीक कहते थे। अँग्रेज़ लोग तो अब सचमुच चले। मैंने कहा कि यह तो चले, लेकिन हमारा मुल्क न चला जाए। वह संभालने की बात है, क्योंकि यदि अब हम गिरेंगे तो अपनी कमजोरी से ही गिरेंगे, किसी और की ताकत से हम कभी गिरने वाले नहीं है। मैंने उनको समझाया था कि आप हमारे साथ मिल कर काम करो। चन्द दिनों के लिए वे हमारे साथ आए भी, रहे भी और हमारे संगठन मे शरीक भी हुए। तब हम सबने मिल कर दिल्ली में एक फैसला किया कि ट्रेड यूनियन के अगले वार्षिक अधिवेशन में जाकर हमें उन लोगों को निकालना है जो हमारी राय के अनुसार ठीक काम नहीं कर रहे। हमारे पास मैजोरिटी है, बहुमत है। सो हम वहां गए। पर इसी जल्से में हमारे सोशलिस्ट भाई से अलग हो गए और कहने लगे कि हम न तो आपके साथ चलेंगे, न उनके साथ रहेंगे। नतीजा यह हुआ कि हमारा काम नही हुआ। इसलिए हम चले आए। हमने अपना एक अलग संगठन वना लिया, जिसका यह दूसरा जल्सा है। पहला जल्सा बम्बई में हुआ था। उस संगठन का नाम इण्डियन नैशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस (आई० एन० टी० यू० सी०) है और यह जो संगठन हमने बनाया है, यह राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस है।
आज हिन्दोस्तान में जो ट्रेड यूनियन कांग्रेस है, वह थोड़ा बोगस है, थोड़ा खोखा है। उसमें जान नहीं। उसमें खाली तूफान करने की जान है, मांग करने की जान है। आज तक तो ट्रेड यूनियन कांग्रेस के ही प्रतिनिधि बाहर जाते थे, जो वहां हमारी बदनामी करते थे और कहते थे कि ये तो कैपिटलिस्टों के पिट्ठू हैं, पूंजीवादी के पिट्ठू हैं। हम लोग सब सुनते रहते थे और बरदाश्त करते रहते थे। जिस जबान से वे बोलते हैं, उस जबान से हम नहीं बोलते। हम तो अपने काम से मतलब रखते थे। आज हमारा अपना संगठन है और उसमें १२ लाख आदमी हैं। आज ८०० से ऊपर हमारे ट्रेड यूनियन की शाखाएँ होंगी, और इतनी संस्थाओं का संगठन बन जाने से हमारे १२ लाख मेम्बर हो गए हैं। उनके कुल मेम्बर ६,७ लाख होंगें। उसमें भी कितने बोगस है, वह मैं नहीं जानता। क्योंकि उनका मेम्बरशिप, बहुत कम सच्चा मेम्बरशिप है। हम मजदूरों से मैला नहीं कराना चाहते और न उन्हें गलत रास्ते पर ले जाना चाहते हैं। उससे मजदूर लोग गिर जाने वाले है। उसको साफ करना चाहिए और साफ बात कहनी चाहिए। मजदूर कभी झूठ न बोलें। वे क्यों झूठ बोलें?
मेरी नज़र से और गान्धी जी की नज़र से भी अगर ताकत वाला कोई आदमी है तो वह मजदूर है, क्योंकि वह अपने हाथ से काम करता है। उसमें इतनी शक्ति है कि वह सूखी रोटी भी हजम कर जाता है। दूसरे को दवा खानी पड़ती है, अच्छी चीज़ें खाकर भी खाना हजम नहीं होता। तो उनमें जो ताकत है, वह यदि संगठित की जाए, तो कोई ताकत उसके सामने नहीं ठहर सकती। लेकिन मजदूरों के पास यह सच्चा संगठन न हो तो मज़दूर भी गिर जाएँ। और मजदूर के संगठन में यदि सत्य न रहा और असत्य का प्रवेश हुआ या उन्हें अपने संगठन की ताकत का गर्व हो गया, तो इससे भी वे गिर जाएँगे। तो गान्धी ने पहले ही से बताया था कि ट्रेड यूनियन कांग्रेस में तब जाना, जब ट्रेड यूनियन कांग्रेस साफ हो। और वह साफ न हो, तो अपनी अलग ट्रेड यूनियन कांग्रेस बनाओ। आज वही अलग बनी है। परदेश में अब उनका प्रतिनिधि नहीं जा सकता, हमारा प्रतिनिधि ही जाएगा।
अगर आज आपको इन्साफ चाहिए, तो उसके लिए न हड़ताल करने की जरूरत है और न भिक्षा मांगने की। अपने हक से आपकी लेबर का एक प्रतिनिधि हिन्दुस्तान की सरकार में बैठा है और उसके पास पूरी ताकत है। जो जो कुछ आपको चाहिए, अगर वह ठीक हुआ तो आपको ज़रूर मिल जाएगा।
लेकिन अगर आप की मांग ठीक न होगी, तो आपका वह प्रतिनिधि आप लोगों से कहेगा कि यह गलत रास्ता है, इस पर चलने से काम नहीं होगा। हमें गलत मांग कभी नहीं करनी चाहिए।
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- वक्तव्य
- कलकत्ता - 3 जनवरी 1948
- लखनऊ - 18 जनवरी 1948
- बम्बई, चौपाटी - 17 जनवरी 1948
- बम्बई, शिवाजी पार्क - 18 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की हत्या के एकदम बाद) - 30 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की शोक-सभा में) - 2 फरवरी 1948
- दिल्ली - 18 फरवरी 1948
- पटियाला - 15 जुलाई 1948
- नई दिल्ली, इम्पीरियल होटल - 3 अक्तूबर 1948
- गुजरात - 12 अक्तूबर 1948
- बम्बई, चौपाटी - 30 अक्तूबर 1948
- नागपुर - 3 नवम्बर 1948
- नागपुर - 4 नवम्बर 1948
- दिल्ली - 20 जनवरी 1949
- इलाहाबाद - 25 नवम्बर 1948
- जयपुर - 17 दिसम्बर 1948
- हैदराबाद - 20 फरवरी 1949
- हैदराबाद (उस्मानिया युनिवर्सिटी) - 21 फरवरी 1949
- मैसूर - 25 फरवरी 1949
- अम्बाला - 5 मार्च 1949
- जयपुर - 30 मार्च 1949
- इन्दौर - 7 मई 1949
- दिल्ली - 31 अक्तूबर 1949
- बम्बई, चौपाटी - 4 जनवरी 1950
- कलकत्ता - 27 जनवरी 1950
- दिल्ली - 29 जनवरी 1950
- हैदराबाद - 7 अक्तूबर 1950








