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इतिहास और राजनीति >> भारत की एकता का निर्माण भारत की एकता का निर्माणसरदार पटेल
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स्वतंत्रता के ठीक बाद भारत की एकता के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा देश की जनता को एकता के पक्ष में दिये गये भाषण
अब मैं आपसे एक बात और कहना चाहता हूँ। आप में से बहुत से देहात में से इन्दौर आए होंगे। देहात में आपका घर होगा, आपके रिश्तेदार होंगे। आपके आसपास के देहातों में क्या हालत है, उस पर नज़र करो तो आपको मालूम पड़ेगा कि वहां जितनी गरीबी है, ईश्वर की कृपा से उतनी गरीबी इधर नहीं है। क्योंकि हम काम करते हैं और रोज शाम तक काम करने से कुछ-न-कुछ दाम हमको मिल ही जाता है। कभी कम मिलता है, कभी ठीक भी मिल जाता है। लेकिन वे लोग, जो बेकार बैठे हैं, उनका गुजारा कैसे चल सकता है। साल भर में केवल तीन चार महीना जब खेती का मौसम आता है, तभी उन्हें मजदूरी मिलती है। बाकी बेकार बैठे रहते हैं। न कोई रोजगार है, न कोई काम है। वे कैसे अपना पेट भरें? तो हमसे बहुत गरीब हजारों, लाखों लोग हिन्दुस्तान में पड़े हैं। हमें पेट भर खाना और अपने बच्चों को भी खिलाना है, लेकिन वह हमारे जो करोड़ों लोग भूखे पड़े हैं, उनके ऊपर भी हमें नज़र रखनी है। नज़र रखने का माइना यह नहीं कि अपनी जेब से निकाल कर कुछ उनको दो। यह बात नहीं है। मैं किसी को भिक्षावृत्ति नहीं सिखाता। उस का तो एक ही उपाय है कि हमारे मुल्क में ज्यादा धन पैदा करो। तभी हम कुछ कर सकते हैं। हमारा मुल्क आज एक ऐसे बदन के समान है, जिसमें से सारा खून निकल गया हो, जैसा पाण्डु रोग का रोगी होता है या दिक का बीमार होता है। क्योंकि हमारे राष्ट्रीय बदन में से सारा खून निकल गया है। इतने साल की गुलामी, उसके बाद यह जो ६ साल की लड़ाई चली, विश्व युद्ध हुआ, उसमें जो चूस हुई, उससे सारा खून निकल गया। अब हमें राज तो मिला, लेकिन इसमें जान हमें नए सिरे से भरनी है। अब आहिस्ता आहिस्ता खून की बूंद-बूंद डाल कर हम इस में जान भर सकते हैं, दूसरी तरह से नहीं। कई लोग कहते हैं कि कांग्रेस का राज आया तो क्या हुआ? हमको तो कुछ भी नहीं मिला। यदि किसी ने यह उम्मीद रक्खी होगी कि अंग्रेज इधर छोड़ जाएगा? उसमें से हम बाँट करेंगे तो उस जैसा कोई वेवकूफ नहीं हैं। वह तो जो कुछ ले जा सकता था, अपने साथ ले गया। हमारा मुल्क आज खाली पड़ा है। मुल्क में हमें सभी कुछ नए सिरे से पैदा करना है। तो वह सब कैसे पैदा करोगे? हम लोग सब एक साथ मिलकर पैदा न करें, तो कैसे काम चलेगा? तो हमारा फर्ज तो यह है कि आज हम अपने मुल्क की हालत देखें और यह समझें कि इस हालत में हमारा धर्म क्या है।
मजदूरों को न्याय चाहिए, तो उस न्याय के लिए लड़ने की उन्हें आज ज़रूरत नहीं रह गई। क्योंकि आज मजदूरों का राज है। लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि नहीं, यह तो पूंजीवादी का राज है। मजदूरों में जाकर वे इस तरह की बातें करते हैं। मैं चाहता हूँ कि वे हमारे सामने आकर बैठें और बताएँ कि हमने किस तरह पूंजीवाद का साथ दिया? हमने कौन-सी बात ऐसी की, जिस से मुल्क को नुकसान हुआ? हमारे मुल्क में इतने पूंजीपति हैं ही नहीं। बहुत कम लोग यहां पूंजीपति हैं। उन सव की पूंजी अगर हम एक दफे बाँट लें, तो देश भर के लोगों के हिस्से एक एक आना यानी चार चार पैसे ही आएंगे। ये चार चार पैसे खाकर फिर क्या करोगे? फिर किसके साथ लड़ेंगे? हमारे देश में करोड़ों लोग भूखे पड़े हैं। यहाँ चन्द पूंजीवालों ने कुछ धन पैदा किया। कुछ बुराई से भी किया, यह कौन नहीं मानता। जिस तरह के काम उन्हें नहीं करने चाहिए, वैसे काम भी उन्होंने किए। लेकिन देश को सम्पन्न बनाने के लिए हमें भी तो कुछ करना चाहिए। हम वह काम क्यों नहीं करते? लेकिन यह समझना चाहिए कि आज हमारी ताकत नहीं है। हिन्दुस्तान की सरकार के पास इतना सामान होता और इतने साधन होते, कि सारे कारखाने हम चला सकते तो हमको क्या दिक्कत थी। लेकिन हम जानते हैं कि हम बारह महीना भी कारखाना नहीं चला सकेंगे और उसमें हमें नुकसान होगा। इस तरह से हमें काम नहीं करना है। तो हमें अक्लमन्दी से काम करना चाहिए। मैं आप लोगों को यह राय दूंगा कि आप को हड़ताल करने की बात छोड़ देनी चाहिए। जैसे हमारे इन्दौर के मजदूरों के प्रतिनिधि ने आपको सुनाया कि हम कभी हड़ताल नहीं करते, और न हड़ताल करने की हमें कभी ज़रूरत पड़ती है।
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- वक्तव्य
- कलकत्ता - 3 जनवरी 1948
- लखनऊ - 18 जनवरी 1948
- बम्बई, चौपाटी - 17 जनवरी 1948
- बम्बई, शिवाजी पार्क - 18 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की हत्या के एकदम बाद) - 30 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की शोक-सभा में) - 2 फरवरी 1948
- दिल्ली - 18 फरवरी 1948
- पटियाला - 15 जुलाई 1948
- नई दिल्ली, इम्पीरियल होटल - 3 अक्तूबर 1948
- गुजरात - 12 अक्तूबर 1948
- बम्बई, चौपाटी - 30 अक्तूबर 1948
- नागपुर - 3 नवम्बर 1948
- नागपुर - 4 नवम्बर 1948
- दिल्ली - 20 जनवरी 1949
- इलाहाबाद - 25 नवम्बर 1948
- जयपुर - 17 दिसम्बर 1948
- हैदराबाद - 20 फरवरी 1949
- हैदराबाद (उस्मानिया युनिवर्सिटी) - 21 फरवरी 1949
- मैसूर - 25 फरवरी 1949
- अम्बाला - 5 मार्च 1949
- जयपुर - 30 मार्च 1949
- इन्दौर - 7 मई 1949
- दिल्ली - 31 अक्तूबर 1949
- बम्बई, चौपाटी - 4 जनवरी 1950
- कलकत्ता - 27 जनवरी 1950
- दिल्ली - 29 जनवरी 1950
- हैदराबाद - 7 अक्तूबर 1950








