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इतिहास और राजनीति >> भारत की एकता का निर्माण

भारत की एकता का निर्माण

सरदार पटेल

प्रकाशक : प्रकाशन विभाग प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :350
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 62
आईएसबीएन :

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स्वतंत्रता के ठीक बाद भारत की एकता के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा देश की जनता को एकता के पक्ष में दिये गये भाषण


मैं आप लोगों को इस पर मुबारकबाद देना चाहता हूँ। साथ ही मैं आप से कहना चाहता हूँ कि इसी रास्ते पर चलने से आपका कल्याण है, दूसरे रास्ते से नहीं। आज अगर बम्बई में या कलकत्ता में, या कानपुर में या अन्य बड़े-बड़े शहरों में हड़तालें की जाएँगी, जलूस निकाले जाएंगे और पुलिस पर जबरदस्ती बोझ डाल कर उसे गोली चलाने पर मजबूर किया जाएगा, तो क्या यह अच्छा होगा? अब जमाना बदल गया। जब अंग्रेजों की पुलिस गोली चलाया करती थी, तब तो आप कह सकते थे कि वह बुरा काम करती है। लेकिन आज जो राज करनेवाले लोग हैं वे तो आपके अपने प्रतिनिधि हैं। यदि आपको वे नापसन्द हों, तो उन्हें बदल दो। लेकिन जनता आपके साथ नहीं है, फिर भी आप जनता की लोकप्रिय सरकार का विरोध कर रहे हैं! अगर वे काम छोड़ दें, तो आप तो दो दिन भी काम नहीं कर सकेंगे। फिर हिन्दुस्तान का क्या हाल होगा? यही वर्मा में हुआ, यही चीन में हुआ और यही मलाया में हो रहा है। इस प्रकार का हाल आपको अपने देश का करना है? क्या हमने स्वराज्य इसीलिए लिया है? क्या इसमें मजदूरों का कल्याण होगा? तो मजदूरों को यह समझ लेना चाहिए कि हमेशा मिल-मालिकों के पीछे पड़ने से उन का काम नहीं होगा। जिस हद तक पीछे पड़ने की जरूरत थी, हम उनके पीछे पड़ चुके हैं, जब और जरूरत होगी तो और भी हम करेंगे। लेकिन हमें अपना साँचा स्वच्छ रखना है और देश की मशीनों से जितना अधिक से अधिक काम निकल सके, निकालना है।

ईमानदारी के साथ अपना काम पूरा कर शाम के समय आप को अपने घर-वापस जाना है, शराबखाने के रास्ते नहीं जाना है। जो कुछ आपने पैदा किया है, वह शराब की दुकान पर दे देना, इसी तरह है, जैसे आप ने कुछ भी न कमाया हो। तव आपको पैसा मिला न मिला, बराबर है। बल्कि वह तो उससे भी बुरा है, क्योंकि शराब पीकर जब वह घर जाएगा तो अपनी औरत और अपने बच्चों को बेहाल करेगा, तंग करेगा, मार-पीट करेगा। उससे क्या फायदा? वह सब हमारी हिन्दुस्तान की संस्कृति से खिलाफ है। तो हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हमारे नेशनल ट्रेड यूनियन के जो मेम्बर हैं, वे और मजदूरों से अलग मालूम पडे, उनका रंग ढंग अलग हो, हमें इस प्रकार की संस्था बनानी है। और वहां मज़दूर बस्ती में अपने बच्चों के खेल-कूद के लिए मज़दूर-परिवारों के दवा-दारू के लिए, बच्चों के शिक्षण के लिए, अच्छा, प्रबन्ध हो, वह सब करना हमारा काम है। मैं आपको मुबारकबाद देना चाहता हूँ कि आपके १७,००० मेम्बर हैं। इधर कुल ३० या ३२ हजार मज़दूर हैं उनमें से १७,०० आपके मेम्बर हैं, यह ठीक है, बहुत अच्छा है। दो दो रुपया देकर आप स्वागत समिति के मेम्बर बने और अपने हाथ की मेहनत से यह सारा इन्तजाम किया। यह स्वावलम्बन और स्वराज्य का एक शिक्षण है। जो काम करता है, हाथ-पैर चलाता है और कुछ नई बात मेहनत करके दिखाता है, वह स्वराज का यह रथ आगे चलाता है। वह बाकी और सबको पीछे छोड़ जाता है। तो आप लोगों ने इस संगठन में इतना करके दिखाया, इसलिए तो मैं आपको मुबारकबाद देना चाहता हूँ। साथ ही मैं यह भी कहना चाहता हूं कि आपने १७,००० मेम्बर तो बना लिए, लेकिन इन्दौर भर में एक भी मज़दूर आपके संगठन से बाहर नहीं रहना चाहिए। कोई क्यों बाहर रहे? आप १७ हजार मेम्बरों का यह कर्तव्य है कि और लोगों को भी आप अपने पास ले आएँ और उन पर जो बुरा असर पड़ रहा है, उसको हटाएँ। आपको यह समझाना चाहिए कि भोले भाले लोग, गलत वार्ता में फँस जाते हैं। ड्न्दौर के मजदूरों के बारे में तो मैं नहीं जानता, लेकिन यहां के कई लोग गान्धी जी के खून से पहले, ऐसे आन्दोलन में फँस गए, जिससे इन्दौर और ग्वालियर कुछ बदनाम हुए। आर. एस. एस. वाले जो लोग कुछ इस तरह से गलत रास्ते पर पड़ गए कि जिससे मुल्क को बहुत नुकसान हुआ। मजदूरों को ऐसी चीजों में नहीं फँसना चाहिए और जब कभी उनको कोई भी राय लेनी हो, तो अपने संगठन के मुख्य आदमी के पास जाना चाहिए। कोई बड़ा मामला हो तो अपने राष्ट्रीय इण्डियन ट्रेड यूनियन कांग्रेस से राय लेनी चाहिए।

यह आपका सद्भाग्य है कि आपको खंडूभाई, गुलजारीलाल आदि लोगों की मदद मिली है। हमारे शास्त्री जी भी ट्रेड यूनियन का अनुभव करके आए हैं। उन्होंने काफी अनुभव किया। हमारी असेम्बली के भी वह मेम्बर हैं। बाहर के मुल्कों में भी वह देखकर आए हैं कि बाहर की क्या हालत है। इस तरह मार-पीट करने से और फिसाद करने से, खून-खराबी के अलावा और चीज नहीं निकलती। हमारे हिन्दुस्तान की नीति तो गान्धी जी के रास्ते पर चलने की है। हम सारी दुनिया में शान्ति चाहते हैं। तो दुनिया की शान्ति, मजदूर की शान्ति से होती है और मजदूर वर्ग ही दुनिया में शान्ति करा सकते हैं। मजदूरों को सही शिक्षण मिलना चाहिए।

कारखाने में काम करने के बाद आप स्वतन्त्र हैं। तब आप ईश्वर का भजन करो और अपने बच्चों को तालीम दो। जितने लोग अभी तक अपने से बाहर है, उनको समझाओ और शान्ति का वातावरण पैदा करो। कारखाने में जब काम करो, तो जितना ज्यादा पैदा हो सके, उतना ज्यादा पैदा करने की कोशिश करो। तब हमारा काम बनेगा। आपसे जो कुछ कहने को था, वह सब मैने कह दिया। हमारे मुल्क में करोड़ों बेकार आदमी पड़े हैं, जिसके पास काम नहीं है, मजदूरी नहीं है, जमीन नहीं है। उनको भी हमें रास्ते पर लाना है। उनको भी कुछ-न-कुछ गृह-उद्योग सिखाना है। उसके लिए भी हमारे संगठन को कुछ ठोस काम करना है। लेकिन जब आपका संगठन पूरा हो जाए, और आपकी ताकत बढ़ जाए, तभी हम उस ओर जा सकते हैं। वे लोग आज बेकार पड़े हैं और दुखी हैं। उनके दुख में भी हमें हिस्सा लेना चाहिए, जिससे हमारा मुल्क मजबूत बने और हम सबका कल्याण हो। मैं उम्मीद करता हूँ कि मैंने जो बाते आप से कहीं उनपर आप विचार करेंगे और अमल करेंगे। (तालियां )

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    अनुक्रम

  1. वक्तव्य
  2. कलकत्ता - 3 जनवरी 1948
  3. लखनऊ - 18 जनवरी 1948
  4. बम्बई, चौपाटी - 17 जनवरी 1948
  5. बम्बई, शिवाजी पार्क - 18 जनवरी 1948
  6. दिल्ली (गाँधी जी की हत्या के एकदम बाद) - 30 जनवरी 1948
  7. दिल्ली (गाँधी जी की शोक-सभा में) - 2 फरवरी 1948
  8. दिल्ली - 18 फरवरी 1948
  9. पटियाला - 15 जुलाई 1948
  10. नई दिल्ली, इम्पीरियल होटल - 3 अक्तूबर 1948
  11. गुजरात - 12 अक्तूबर 1948
  12. बम्बई, चौपाटी - 30 अक्तूबर 1948
  13. नागपुर - 3 नवम्बर 1948
  14. नागपुर - 4 नवम्बर 1948
  15. दिल्ली - 20 जनवरी 1949
  16. इलाहाबाद - 25 नवम्बर 1948
  17. जयपुर - 17 दिसम्बर 1948
  18. हैदराबाद - 20 फरवरी 1949
  19. हैदराबाद (उस्मानिया युनिवर्सिटी) - 21 फरवरी 1949
  20. मैसूर - 25 फरवरी 1949
  21. अम्बाला - 5 मार्च 1949
  22. जयपुर - 30 मार्च 1949
  23. इन्दौर - 7 मई 1949
  24. दिल्ली - 31 अक्तूबर 1949
  25. बम्बई, चौपाटी - 4 जनवरी 1950
  26. कलकत्ता - 27 जनवरी 1950
  27. दिल्ली - 29 जनवरी 1950
  28. हैदराबाद - 7 अक्तूबर 1950

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