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भारत की एकता का निर्माण

सरदार पटेल

प्रकाशक : प्रकाशन विभाग प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :350
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 62
आईएसबीएन :

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स्वतंत्रता के ठीक बाद भारत की एकता के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा देश की जनता को एकता के पक्ष में दिये गये भाषण


(23)

अभिनन्दन समारोह में
दिल्ली,
31 अक्तूबर, 1949

प्यारे भाइयो और बहनों,
जिस प्रेम से आप लोगों ने मेरा स्वागत किया, उससे मेरा दिल भर आया है। मेरे साथियों ने जिन शब्दों में भाव प्रकट किए, उससे अब इस मौके पर मेरी जबान पर और भी बोझ पड़ गया है और क्या कहना, क्या न कहना, यह समझ में नहीं आता। वैसे तो मेरे प्यारे भाई राजेन्द्र बाबू ने आप लोगों से कहा कि मैं कम बोलनेवाला आदमी हूँ। क्यों? मैं क्यों कम बोलता हूँ? एक सूत्र है, जो मैंने सीख लिया है : ''मौनं मूर्खस्य भूषणम्''*। (हँसी) ज्यादे बोलना अच्छा नहीं। वह विद्वानों का काम है। लेकिन जो हम बोलें, उसी के ऊपर हम चल न सकें, तो हमारा बोलना नुकसानकारी है। इसलिए भी मैं कम बोलता हूँ। लेकिन जब मौका आता है, तो मेरी जबान खुलती है। जब समय नहीं है, तब मैं बोल नहीं सकता। अब आप लोगों ने जो प्रार्थना मेरे लिए की, जो आशीर्वाद मुझे दिया, उससे मुझे थोड़ा उत्साह होता है कि और भी आगे कुछ जीवन बढ़ाना, कुछ सेवा करना ठीक है। बाकी यह साल मेरे लिए काफी कठिन बीता है। खाली शारीरिक कठिनाइयों की तो मैं परवाह नहीं करता, क्योंकि कौन नहीं जानता है कि
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*(मौन मूर्ख का भूषण है।)

शरीर तो मिट्टी का बना हुआ है, वह मिट्टी में ही चला जाएगा। जब उसका समय आएगा, तो उसका कोई उपाय करने वाला भी नहीं होगा। लेकिन मुल्क के लिए यह साल बहुत कठिन गुजरा है। मुझे रात-दिन उसी का दर्द रहता है। सामने की ओर देखता हूँ तो अभी आगे जो साल आनेवाला है, वह उससे भी कठिन दिखाई देता है। यह तलवार की धार पर चलने के समान होगा। थोड़ा-सा भी आगे-पीछे चले, तो हम मुल्क को खड्ड में डाल देंगे। मेरे जैसे आदमी के लिए तो कुछ बाकी नहीं रहा है। दुनिया में और खास तौर से हिन्दुस्तान-जैसे मुल्क में ७४ वर्ष की आयु बहुत होती है। जैसी आप लोगों की आज मेरे लिए हृदय की भावना है, ऐसी भावना देखकर जाने से बेहतर तो कोई और जाना अच्छा नहीं हो सकता।

तो मैं ईश्वर से रात-दिन प्रार्थना करूँगा कि जो भाव आप के दिलों में भरे हैं, प्रेम का और जो शुभाशीष आप मुझे दे रहे हैं, उसके लिए मैं जबतक जिन्दा रहूँ, दिन-पर-दिन अधिक लायक होता रहूँ। लेकिन हमारा नेता, हिन्दुस्तान का नेता, तो आज परदेस में हैं*। मेरा काम तो मर्यादित है कि उनके हाथ-पैर मजबूत करना, जब तक मुझ से हो सके। अब वह अपनी शक्ति से बाहर हमारी इज्जत बढ़ा रहा है। और दुनिया में हमारी जो इज्जत बढ़ी है, वह  'सब से ज्यादा तो गान्धी जी ने वढ़ाई है। उनके जीवन से बड़ी, उनकी मृत्यु से और ज्यादा बढ़ी। दूसरा हमारा आज का नेता जिस स्नेह से और जिस भाव से बाहर अपना काम कर रहा है, उससे भी हमारी इज्जत बड़ी है। लेकिन आखिर यदि हमें अपने मुल्क की सच्ची इज्जत बढ़ानी है और उसकी रक्षा करनी है, तो हमें अपना घर सब से पहले संभालना पड़ेगा। जिसका घर ठीक नहीं है, उसकी बाहर कितनी भी इज्जत हो, वह ज्यादा दिन नहीं चलेगा। तो दुनिया को हमसे जो उम्मीद है, वह उम्मीद पूरी करना हमारा काम है। हमारे कितने ही साथी, जो कांग्रेस से बाहर निकल गए, आज हमारी आलोंचना करते हैं। कई तो यहाँ तक कहते हैं कि अंग्रेज का राज्य भी आज के राज्य से अच्छा था। वे वहाँ तक पहुँच गए, यह बदकिस्मती की बात है। क्योंकि जब दिल में इस तरह का भाव आता है, तब यह सिद्ध होता है कि हम गुलामी

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*(प्रधान मन्त्री जवाहरलाल उन दिनों संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में प्रेजीडेंट ट्रूमैन के निमन्त्रण पर गए हुए थे।)

ज्यादा पसन्द करते हैं। लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि सदियों की गुलामी जो हमारे छाती पर बैठ गई थी, उसका बोझ इतना भारी था कि जब इस बोझ को किसी तरह से हमने उठाकर फेंक दिया, तो हम इतना थक गए कि अपने सांस पर काबू रखने की शक्ति भी हमारे पास नहीं रही। अभी भी वह पूरी तरह नहीं आई है। करीब-करीब मुर्दा में जान डाली गई है। चलने लायक तो हम अभी तक हुए ही नहीं हैं। अभी हमें चलना सीखना है। उसके पहले ही हम दौड़ने की कोशिश करेंगे, तो हमारे पैर टूट जाएँगे।

कोई यह समझे कि मुल्क में जो भुखमरी का दुख है, वह हमें अज्ञात है, तो सारी जिन्दगी भर हमने काम क्या किया है? हम इतने अज्ञानी होते, तब तो हम ऐसे ही नालायक होते, जैसे चर्चिल साहब ने एक दफा कहा था कि ''आपने 'मैन आफ स्ट्राज' (तिनके के आदमियों) के हाथ में भारत को सुपुर्द कर दिया है।'' लेकिन अब वह खुद भी महसूस करता है कि यह ''मैन आफ स्ट्राज' नहीं हैं, इनमें कुछ तत्व है। लेकिन एक चीज़ आप को नहीं भूलनी चाहिए कि दुनिया में हर जगह पर आज दुख है। और जो चीज़ हमें चाहिए, वह है आर्थिक स्वतन्त्रता। वह हमारे पास नहीं है। यह केवल हमारे हाथ की बात नहीं है। दुनिया के जो बन्धन हमारे सामने, हमारे बीच में खड़े हुए हैं, उसमें से निकलना तो बड़ा विकट काम है। एक डीवैल्युएशन (मुद्रा का अवमूल्यन) हुआ, उससे कितनी-कितनी मुश्किलात पैदा हुईं? बेचारा देहात में काम करनेवाला किसान या फैक्टरी में काम करनेवाला मजदूर और अन्य सामान्य लोगों को क्या मालूम पड़ता है कि ये कठिनाइयाँ क्या हैं? लेकिन जो लोग इन कठिनाइयों से घबराते हैं, वे कुछ काम नहीं कर सकते। कितनी भी कठिनाइयाँ सामने हों, लेकिन इन्सान में ताकत दी गई है कि वह उन कठिनाइयों का मुकाबला करे। यह मर्दों का काम है, कायरों का काम नहीं है। तो हमें घबराना नहीं चाहिए। लेकिन आज कोई कहे कि हमने पार्लियामेंट तो बनाई और आजादी पा ली। लेकिन इस पार्लियामेंट में कोई गवर्नमेंट का सामना करनेवाले नहीं हैं। ठीक है, लेकिन यह पार्लियामेंट तो बच्चा है। हम पार्लियामेंट में केवल परदेशियों की नकल करना नहीं चाहते हैं। हमें हिन्दुस्तान के ढंग के अनुसार पार्लियामेंट बनानी है। गन्धी जी ने पार्लियामेंट के बारे में बहुत कुछ लिखा है, मैं उसका जिक्र यहाँ नहीं करना चाहता हूँ। लेकिन मैं यह कहना चाहता हूँ कि कम-से-कम जब तक हिन्दुस्तान मजबूत न हो, उनके नसों में रुधिर बहने न लगे, तब तक हमें आपस में एक दूसरे के सामने मोर्चा बांधने से कोई फायदा नहीं होता। आप लोगों को यह समझना चाहिए कि यदि हमें आर्थिक स्वतन्त्रता चाहिए, तो उसके लिए हमें काफी कुर्बानी करनी पड़ेगी। जो कुर्बानी हमने आज़ादी पाने में की, उससे दूसरी प्रकार की यह कुरबानी होगी और उसमें काम भी दूसरे प्रकार से करना पड़ेगा। तो उससे आज खेत में काम करनेवाले किसान, फैक्टरी में काम करने वाले मजदूर, सामान्य वर्ग, जिसको मध्यम वर्ग कहा जाता है, जिसके ऊपर आज सबसे अधिक बोझ पड़ा है, और धनिक लोग सबको कष्ट है। मान लीजिए, धनिकों को अधिक कष्ट नहीं होगा। तब भी हमारे मुल्क में धनिक तो बहुत कम हैं। हमारा मुल्क गरीब है, और उसमें बहुत थोड़े धनिक लोग हैं। रात दिन उन्हीं के पीछे लगे रहने से हमको कोई फायदा नहीं होगा। फायदा हो तो, मैं भी आप के साथ शरीक हो जाऊँगा। लेकिन मैं जानता हूँ कि हमारे मुल्क में अनुभववाले लोग बहुत कम हैं। और सब लोग कहते हैं कि हमें आर्थिक स्वतन्त्रता चाहिए। साथ ही सब तो नहीं, पर कई लोग कहते हैं कि सारा उद्योग सरकार को अपने हाथ में ले लेना चाहिए। सारी इण्डस्ट्री नेशनलाइज़ (व्यवसायों का राष्ट्रीयकरण) करनी चाहिए। वह केवल सिद्धान्त की बात है। वह सब अनुभव की बात नहीं है। क्योंकि हमने अभी तक कुछ काम तो किया नहीं है, और जो कहते हैं उन्होंने तो कुछ भी नहीं किया। वह कब करेंगे, वह तो ईश्वर के हाथ की बात है। मैं नहीं जानता। करें तो हमारे लिए बहुत अच्छा हो जाएगा। लेकिन अगर आज मैं नेशनलाइज़ेशन (राष्ट्रीयकरण) के बोझ को उठा सकूं तो एक मिनट की भी देरी नहीं करूँगा। लेकिन हमारे मुल्क में जितनी शक्ति है, उस सबका हमें उपयोग करना है और मुल्क में आर्थिक स्वतन्त्रता पैदा करने में सबका साथ लेना है। उसमें सब को थोड़ी-थोड़ी कुर्बानी करनी पड़ेगी। हमें सब का साथ लेना पड़ेगा। उसमें आप लोग समझपूर्वक जितना ज्यादा साथ देंगे, उतना ही अच्छा है।

ये जो पंजाब से या सिन्ध से भागे-भागे शरणार्थी आए है उन लोगों का दुख क्या मजदूरों और किसानों के दुख से कम है? किन से कम है उनका दुख? उन्होंने सब चीज गंवाई है, लेकिन हिम्मत नहीं गँवाई। जब तक हिम्मत है, तब तक सब ठीक है। जब हिम्मत गुम जाती है, तब मनुष्य नीति से भ्रष्ट हो जाता है और नीति गई तो आत्मा भी गया। सब खत्म हो गया। तो उनके दुख के सामने देखें, तो ऐसा दुख तो बहुत कम आदमियों को पड़ा है। हमको भी नहीं पड़ा है। सो हम उस दुख का अन्दाज नहीं लगा सकते हैं।

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    अनुक्रम

  1. वक्तव्य
  2. कलकत्ता - 3 जनवरी 1948
  3. लखनऊ - 18 जनवरी 1948
  4. बम्बई, चौपाटी - 17 जनवरी 1948
  5. बम्बई, शिवाजी पार्क - 18 जनवरी 1948
  6. दिल्ली (गाँधी जी की हत्या के एकदम बाद) - 30 जनवरी 1948
  7. दिल्ली (गाँधी जी की शोक-सभा में) - 2 फरवरी 1948
  8. दिल्ली - 18 फरवरी 1948
  9. पटियाला - 15 जुलाई 1948
  10. नई दिल्ली, इम्पीरियल होटल - 3 अक्तूबर 1948
  11. गुजरात - 12 अक्तूबर 1948
  12. बम्बई, चौपाटी - 30 अक्तूबर 1948
  13. नागपुर - 3 नवम्बर 1948
  14. नागपुर - 4 नवम्बर 1948
  15. दिल्ली - 20 जनवरी 1949
  16. इलाहाबाद - 25 नवम्बर 1948
  17. जयपुर - 17 दिसम्बर 1948
  18. हैदराबाद - 20 फरवरी 1949
  19. हैदराबाद (उस्मानिया युनिवर्सिटी) - 21 फरवरी 1949
  20. मैसूर - 25 फरवरी 1949
  21. अम्बाला - 5 मार्च 1949
  22. जयपुर - 30 मार्च 1949
  23. इन्दौर - 7 मई 1949
  24. दिल्ली - 31 अक्तूबर 1949
  25. बम्बई, चौपाटी - 4 जनवरी 1950
  26. कलकत्ता - 27 जनवरी 1950
  27. दिल्ली - 29 जनवरी 1950
  28. हैदराबाद - 7 अक्तूबर 1950

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