इतिहास और राजनीति >> भारत की एकता का निर्माण भारत की एकता का निर्माणसरदार पटेल
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स्वतंत्रता के ठीक बाद भारत की एकता के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा देश की जनता को एकता के पक्ष में दिये गये भाषण
मैं आप से जो कह रहा था, इन्हीं हालात में चार महीने में हमने ये सब काम कर लिए। सारा हिस्सा बाँटकर लिया, न कोर्ट में जाना पड़ा, न किसी और जगह पर जाना पड़ा। साथ-साथ हमारी किस्मत में जूनागढ़ की समस्या भी आई। उसे जिस तरह से हमने ठीक किया, दुनियावाले लोग उसे देखते रहे। वे जानते हैं कि हम लोगों पर जो बोझ पड़ा है, वह बोझ अगर दूसरी गवर्नमेंट पर पड़ा होता तो उसकी कमर टूट जाती। इससे हमारी इज्जत काफी बढ़ी है। मैं दावा करता हूं कि चार महीने में यह जितना काम हुआ है उसे पूरा करना भी बहुत कठिन काम था। हमने उसे किस तरह से किया यह आप जानते हैं। अभी भी हमारा कुछ काम बाकी है। अभी हमारे 8 लाख सिन्धी भाइयों को इधर ले आना है। वह आ रहे हैं, तो लाने-लाने मे ही काफी समय लगेगा। क्योंकि हमारे पास इतने बोट भी नहीं है। एक छोटी सी रेलवे जोधपुर की तरफ जाती है। उसमें भी एक छोटी रेलवे है, उसमे दो सौ ढाई सौ आदमी आते हैं। रास्ते में जोखम भी है। बहुत मुश्किल काम है।
सिन्धी लोग, जो दुनिया भर में व्यापार करते थे और लाखों, करोड़ों रुपयों का व्यापार करते थे। वे धनी लोग थे, वे सुखी लोग थे। लेकिन आज उनके पास कोई चीज बाकी नहीं है। सब खाली हो गया है। यों तो जो इन्सान पैदा होता है, वह एक दिन जरूर मरेगा। लेकिन इस तरह जो उसका मान भंग होता है, वह बहुत बुरा है। वे न इधर के हैं, न उधर के हैं। उधर अब कोई उनकी परवा नहीं करता, और वे दुःखों के बोझ से दब गए हैं। अब अगर इधर भी हम उनको अपना न समझें, यह न समझें कि उनके ऊपर जो यह आपत्ति आई है, यह तो असल में सारे हिन्दुस्तान पर विपत्ति है, इस समय हम उनकी मदद न करें, तो वह कितना बुरा होगा! हमें इस चीज को ठीक करना है। तो यह आप लोगों का काम है। आपका बम्बई शहर कितना बड़ा है। इस बम्बई शहर के हर एक घर में दो-दो सिन्धी रख लो। आठ लाख में से सब-के-सब सिन्धी तो इधर आनेवाले हैं नहीं। जितने सिन्धी आनेवाले हैं, उन में तीन-चार लाख तो तीस या चालीस लाख की आबादीवाले इस बम्बई में खप ही सकते हैं। अगर हम अपने दुखी आदमियों को भी हजम नहीं करेंगे, तो हम स्वराज्य कैसे हजम करेंगे? तो मैं आप से यह कहना चाहता हूँ कि हमारा और आपका काम है कि हमारे जो सिन्धी दुखी भाई यहाँ आए हैं, हम उनकी तलाश करें। हम पता चलाएँ कि कौन आया है, कहाँ आया है। एक-एक को अपने पास रख लो और उसको सँभाल लो। और ये ऐसे लोग नहीं है कि कोई भिक्षुक हों, या भिक्षुक बनना चाहते हों। पहला मौका मिलते ही वे अपना कार्य ठीक कर लेंगे, क्योंकि वे बहादुर लोग है, वे कुशल लोग हैं। हां, अभी उनमें गुस्सा भरा हुआ है, उनका दिमाग इस वख्त बिगड़ा हुआ है। उनकी जगह पर हम और आप में से भी कोई होता, तो उसका दिमाग भी बिगड़ जाता। तो हमें उनको सँभालना है। इस मौके पर उनके साथ सहानुभूति न बताओ तो मुश्किल हो जाएगा। तो आपके पास मेरी नम्र विनती यह है कि आप समझ लें कि यह हमारा धर्म है। और यह फर्ज यदि हम अदा नहीं करेंगे तो हम पर मुसीबत आनेवाली है।
अब यह तो मैंने आज थोड़ा-सा चित्र आपको दिया कि हमने अब तक क्या किया है। लेकिन अपनी कहानी सुनाने के लिए मैं नहीं आया। हमारी उम्मीद क्या है, हमें करना क्या चाहिए, वह सुनाने के लिए मैं आया हूँ। इसमें मुझे बहुत निराशा होती है, क्योंकि हमारे कई नौजवान भाई समझते है' कि उन्हें अपनी लीडरशिप सिद्ध करने या अपनी नेतागीरी प्रसिद्ध करने का मौका मिला है। यह देखकर मुझे बड़ा दुख होता है। सारे हिन्दुस्तान का भविष्य तो आपके पास पड़ा है, आपको सिद्ध किसके पास करने की जरूरत है?
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- वक्तव्य
- कलकत्ता - 3 जनवरी 1948
- लखनऊ - 18 जनवरी 1948
- बम्बई, चौपाटी - 17 जनवरी 1948
- बम्बई, शिवाजी पार्क - 18 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की हत्या के एकदम बाद) - 30 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की शोक-सभा में) - 2 फरवरी 1948
- दिल्ली - 18 फरवरी 1948
- पटियाला - 15 जुलाई 1948
- नई दिल्ली, इम्पीरियल होटल - 3 अक्तूबर 1948
- गुजरात - 12 अक्तूबर 1948
- बम्बई, चौपाटी - 30 अक्तूबर 1948
- नागपुर - 3 नवम्बर 1948
- नागपुर - 4 नवम्बर 1948
- दिल्ली - 20 जनवरी 1949
- इलाहाबाद - 25 नवम्बर 1948
- जयपुर - 17 दिसम्बर 1948
- हैदराबाद - 20 फरवरी 1949
- हैदराबाद (उस्मानिया युनिवर्सिटी) - 21 फरवरी 1949
- मैसूर - 25 फरवरी 1949
- अम्बाला - 5 मार्च 1949
- जयपुर - 30 मार्च 1949
- इन्दौर - 7 मई 1949
- दिल्ली - 31 अक्तूबर 1949
- बम्बई, चौपाटी - 4 जनवरी 1950
- कलकत्ता - 27 जनवरी 1950
- दिल्ली - 29 जनवरी 1950
- हैदराबाद - 7 अक्तूबर 1950